भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

सूत्र-४२ 201 वास्तुशास्त्रोद्भवं वेदेशे मानसङ्ख्या मानं सङ्ख्यायाश्च प्रमाणतः । पद्मपदेकः ? प्रमाणशास्त्रतः वास्तुशास्त्रार्थदीपकाः ॥ 19 ॥ वेदेश के द्वारा वास्तुशास्त्रोद्भव करते समय मापने के लिए प्रयोग करने हेतु प्रमाणतः मान संख्याओं को पद्म प(त्र)क रूप में प्रमाण शास्त्र को वास्तुशास्त्र के लिए अर्थ को समझने के लिए दीपिका या प्रकाश स्वरूप बनाया है । हस्तः करो जिनाङ्गुलो द्वितालो मानदण्डकः । वर्णवभुजोमाख्याता तमुशास्त्रास्तुया ग्रहस्ताना ? ॥ 20 ॥ हस्त, गज, कर आदि संज्ञा से कम्बिका मानदण्ड का जिनाङ्गुल अर्थात् 24 अङ्गुल प्रमाण का द्विताल अर्थात् 12 + 12 ताल अर्थात् 24 अङ्गुल प्रमाण का होता है। इसी को वर्णवभुज भी कहते हैं। इसी से ये शाश्वत हाथ-हस्त-गज-कर भी कहा जाता है। ( वर्णचतुष्क विख्यातः तत्तु शाखासु या गृहस्थानाम ? ) घन निबिड निर्घूट शिलार्थ ? द्विकरो दण्डार्थः युग्महस्तावदार्धा ? ॥ 21 ॥ (यह वर्ण चतुष्क विख्यात है। इससे शा(स्त्रा)स्तु या गृहस्थों को) ? घन निबिड़ निर्घूट शिलार्थ को ? दो हाथ को दण्डार्थ युग्महस्ता, दो हाथ के बराबर अर्थात् आधा ? द्विगुण द्विहस्तानां तुत्र इषु जिनन्य इषु त्रिपाद दण्ड पा ( प्रा ) दु ( द ) नश्च ।


षष्ठिसहस्राणि सगरस्य महात्मनः । लक्षमिन्दीवराक्षीणां शशबिन्दोरभूदिति। पूर्णं षष्टिसहस्रेण पुत्रलक्षं मुरद्विषः ॥ अर्थात्— सौ की संख्या में सौ भिषक्, तारेन्द्र, यज्ञपुरुष की आयु, रावण की अङ्गुलियाँ, शतदल (कमल), धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव, समुद्र के योजन। हजार हैं- शेष नाग के मस्तक, गङ्गा के मुख, कमल के पत्र (दल), सूर्य की रश्मियाँ, सहस्रार्जुन के हाथ, वेद की शाखाएँ और इन्द्र की आँखें। दो सहस्र गिनी जाती है वासुकि और शेषनाग की जिह्वाएँ। अयोध्यावासियों की आयु दस हजार वर्ष की होती थी। पुष्पवाहन भूपति के पुत्रों की संख्या भी 'अयुत' (दस हजार) थी। महात्मा सगर के आठ हजार पुत्र थे। शशबिन्दु (विष्णु या चन्द्र) की एक लाख कमललोचना पत्नियाँ थीं। साठ हजार से पूर्ण एक लाख पुत्र मुररिपु (विष्णु) के थे। सङ्गीत में भरत का मत यही है। लक्षाणि षट् प्रचक्ष्यन्ते काकायुर्वत्सराः किल। नवलक्षं रामरुद्रनरेन्द्रस्य धनुर्धराः ॥ पुरोक्तः शशबिन्दूयों दशलक्षाणि तत्सुताः। रन्तिदेवस्य नृपतेः पुत्राः कोटितयोदिताः ॥ छलात् प्रकाशिता संख्या प्रायो ज्योतिर्विदां मुदे ॥ अर्थात्— कौए की आयु के वर्ष छह लाख कहे जाते हैं। राम और रुद्र नरेन्द्र के नौ लाख धनुर्धर थे। शशबिन्दु के दस लाख पुत्र थे। राजा रन्तिदेव के करोड़ पुत्र कहे गए हैं। इस प्रकार गणितज्ञों के चित्र के आनन्द हेतु ये संख्याएँ प्रकाशित की गई हैं। (पं. शुभङ्कर लाहिड़ी कृत सङ्गीतदामोदर स्तबक पञ्चम)