अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें202 अपराजितपृच्छा द्वासमभ्याङ्गुलं प्रोक्तं पक्षहस्तनि ( द्वि ) हस्तानाम ? ॥ 22 ॥ दो हाथ से दुगुना ( यह श्लोक भ्रष्ट है । ) दण्डश्चापो धनुः स्मृतर्भुमाप्य बृहद्करशिलायाम् ? । मविघ्न ( धन ) श्र ( स्य ) तु हस्तानामेव च ? ॥ 23 ॥ दण्ड को चाप और धनु भी कहा जाता है जिनसे भूमि और बड़ी-बड़ी शिला को मापते हैं......( शेष श्लोक भ्रष्ट होने से अर्थ अस्पष्ट है ।) अन्वयसन्ताकश्च सन्तानोद्भव मानतः । सृष्ट्युद्भवं दण्डाग्र आदिछन्द पर्वनिष्काशः ? ॥ 24 ॥ एकोद्भवमालाक्ष आद्योक्त माप्य घराक्ष घ ( र ) न्यम ! । करतलवंश विंशतिहस्तानां च ? ॥ 25 ॥ ( उक्त दोनों श्लोक भ्रष्ट होने से अर्थ अस्पष्ट है ।) यवान्तं प्रमाणं मध्यं प्रयुक्तं परमाणुतः । मध्याङ्गुलस्य कथये अंशाश्चैव प्रमाणतः ॥ 26 ॥ अङ्गुलस्याष्टमांशं यद् तन्मानं निन्यशो यवः । द्विरष्टांशो भवेच्छिख्या ? अंशानां चतुर्विंशतिः ॥ 27 ॥ परमाणु को आधार मानकर यव-जौ मोटाई तक माप के प्रयोग से मध्यमा अङ्गुलि की मोटाई अंश का माप बना इस प्रमाण से मध्यमा अङ्गुलि के अष्टमांश से जो माप बनता है उसे यव कहते है। दो अष्टांश के बराबर शिख्या ? होती है। अंश चौबीस होते हैं। अङ्गुलस्याष्टमांशेन यवो यूका तदंशतः । लिक्षा यूकाष्टमांशेन केशां तदष्टमांशकम् ॥ 28 ॥ अङ्गुलि मध्यमा की मोटाई का अष्टमांश यव होता है, यव का अष्टमांश यूका तथा यूका का अष्टमांश लिक्षा और लिक्षा का अष्टमांश केशाग्र होता है। रेणुः केशस्याष्टमांशः प्रमाणं तत्तदंशतः । तस्याष्टमांशे छाया च कथिताश्च क्रमेण तु ॥ 29 ॥ उक्त केशाग्र का अष्टमांश रेणु और रेणु का अष्टमांश परमाणु तथा परमाणु का अष्टमांश छाया क्रमवार कह दिया गया है। प्रयुक्तं मानमुद्दिष्टं प्रमाणशास्त्रदीपकम् । निघण्टु भाषोत्तमाख्या प्रयुक्ता वास्तुवेदिभिः ॥ 30 ॥