भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 535 में से

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सूत्र-४३ 203 ये मान अर्थात् माप करने की लम्बाई प्रमाण पूर्वक बता दी है। वास्तुशास्त्र के दीपक की तरह काम करके ज्ञान का प्रकाश होगा। इसी उद्देश्य से वास्तुवेत्ताओं ने भाषा में बड़े उत्तम तरीके से यह निघण्टु-शब्द पर्यायकोश प्रयुक्त किया है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचोक्तापराजितपृच्छायां गणिशब्दनिघण्टवधिकारो नाम द्विचत्वारिंश सूत्रम् ॥ 42 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गणित शब्द निघण्टु अधिकार नामक बयालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 42 ॥ ज्योतिषपञ्चाङ्गवासना नाम त्रयश्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 43 ॥ विश्वकर्मावाच — ज्योतिषं च प्रवक्ष्यामि ¹पञ्चपदार्थकोत्तमम्। यतः समस्तमुत्पन्नं चन्द्रार्कद्रुतिवेदनम् ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि अब मैं ज्योतिष के बारे में कहता हूँ जो उत्तम पाँचवें पदार्थ की तरह है (चार पदार्थ- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष है), ज्योतिष इनमें पाँचवाँ कहा है जिससे चन्द्र, सूर्य आदि की द्रुत गति आदि जानने की समस्त जानकारी प्राप्त होती है। अथ ज्योतिषमाहात्म्याह — यथा दिनं विना सूर्य शशाङ्कं शर्वरी विना। कुटुम्बिनो विना पुत्र शास्त्रं वै ज्योतिषं विना ॥ 2 ॥ ज्योतिष का महत्व बताने के लिए कहा है कि जिस प्रकार सूर्य के अभाव में दिन का होना व्यर्थ है, चन्द्र के प्रकाश बिना रात्रि होना व्यर्थ है, कुटुम्ब में पुत्र बिना सब व्यर्थ है उसी प्रकार समस्त शास्त्र भी ज्योतिष के अभाव में व्यर्थ लगते हैं। तिथिवारंश्च नक्षत्रं योगः करण एव च। ²चन्द्रार्कयोश्च सङ्क्रान्त्या वक्ष्ये पञ्चाङ्गवासनाः ॥ 3 ॥

  1. 'ज्योतिषं च प्रवक्ष्यामि पञ्चमादार्थकोत्तमम्। यतोद्भव समस्तवेदं चन्द्रार्कमिववाछति' इति न. पाठः। इस श्लोक में 'पञ्चपञ्चाङ्गकोत्तमं' पाठ सम्भव है क्योंकि सूत्र का शीर्षक भी इसे कहता है। ज्योतिषपञ्चाङ्ग में तिथि, वार, योग, करण और नक्षत्रों की गणना होती है। महर्षि गर्ग का मत है— ज्योतिश्चक्रे तु लोकस्य सर्वस्योक्तं शुभाशुभम्। ज्योतिर्ज्ञानं च यो वेद स याति परमां गतिम् ॥ (मुहूर्तचिन्तामणि, पीयूषधाराटीका 1, 2)
  2. 'सङ्क्रान्ति चन्द्रसूर्यश्च कथयपञ्चाङ्गसना' इति न. पाठः।