भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 535 में से

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पृष्ठ 251

अपराजितपृच्छा तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण में चन्द्र और सूर्य की जब-तब संक्रान्ति होती है, उसे ही पञ्चाङ्ग-वासना कहते हैं। अथ संवत्सरानयनं — कल्पन्तस्था कृताद्या च प्रतिष्ठाप्येव भुक्तिका। संवत्सरैर्हरिद्भागं लब्धं शेषैक कृताः ? ॥ ४ ॥ संवत्सरैः पुनर्भार्गं लब्धं सूत्र समुद्धरेत ? । एकनवट्याष्टशताभिष्टश्रं ? तदाङ्कः शाक उच्यते¹ ॥ ५॥ कृत् अर्थात् सतयुग से लेकर कलियुग के अन्त तक जितने वर्ष अर्थात् संवत्सर भुक्त हुए, उनको प्रतिष्ठित करें। भुक्त संवत्सर को घटाने-हरने से जो भाग शेष बचता है लब्ध होता है एक कृता ?। संवत्सरों, वर्ष के पुनः भाग करके जो लब्ध आए उससे सूत्र समुद्धरेत, बनाएँ। इससे जो मान बनता है वह एकानवे के ऊपर आठ सौ (891 इष्टश्र ?) होते हैं, इस अङ्क को 'शक' कहते है।² तथाङ्कं नखाङ्गहीनमर्कगणचैत्रादियुक्³ ? । त्रिस्थानैः स्थापयेच्चैवं नन्दयुग्मयमैस्तथा ॥ ६ ॥ फलवेदगुणा मध्याः पातं वाष्टनियोजिताः। शून्यरामेन्दुभिर्भागैर्योजयेत् प्रथमं फलम् ॥ ७॥ अनष्टकारे शेषः ? पञ्चरामनिशाकराः⁴। मासे धनोभ्यनष्टहीना षष्ठिभागैः शेषमृणम् ॥ ८ ॥

  1. 'कृतान्यो कृति क्रंतस्था उक्तिमेवं प्रतिष्ठयेत्। संवत्सरे हरेद्भागं लघुशेषा कृत कृता॥ संवत्सरो पुनर्भागं लब्धं सूत्रं समुद्धरेत्। एकनवट्याष्टाशतमिष्टेश्च तदशंकश उच्यते॥' इति न. पाठः।
  2. यहाँ पाठ भ्रष्ट होने से यह विधि युक्तिसंगत प्रतीत होती है कि कल्पोक्तगत वर्ष में 1972947179- 1706430 घटाने पर 195583617 ये सृष्टि से शकादि तक सौर वर्ष हुए। इसमें इष्ट शक जोड़ने पर अभीष्ट शक के प्रारम्भ में सृष्टि से वर्ष संख्या होती है : नन्दान्द्रीन्दुगुणाष्टाष्टबाणपञ्चनवेन्दवः (1972947179)। संयुक्ताः शककालेन सृष्टिसंवत्सरा गताः॥ (बृहद्दैवज्ञरञ्जनम् 3, 28) श्रीपति के अनुसार शक संख्या जानकर बार्हस्पत्य संवत्सर की संख्या और वर्तमान नाम जानने की रीति यह है कि जिस शक में बार्हस्पत्य संवत्सर का नाम जानना हो उसे शाके की संख्या को पृथक रखकर, 22 से गुणा कर प्राप्त गुणनफल में 4291 का योग करें उपरान्त उसमें 1875 का भाग दें। वर्ष-मास आदि जो प्राप्त हो उसको अलग रखे हुए शाक संख्या में जोड़े और 60 से तष्टित करने से शाकारम्भ समय में प्रभव आदि 60 संवत्सर के भुक्त वर्षादि समझना चाहिए। भुक्त वर्षादि को 60 में घटाने से भोग्य वर्षादि होते हैं— शकेन्द्रकालः पृथगाकृतिघ्नः₂₂ शशाङ्कनन्दाक्षियुगैः₄₂₉₁ समैतः। शराद्रिवस्विन्दु₁₈₇₅ हतः सलब्धः षष्ट्यासशेषे प्रभवादयोऽब्दाः॥ (ज्योतिषरत्नमाला 1, 3)
  3. 'तथायां ततथंणहीनं अर्कगणा चैत्रादिमासपूत्' इति न. पाठः।
  4. 'अनष्टकारे शेषः सवरामनिशाकराः। मासे धनो अनष्टं हीनां कष्टभोगकं सिखरिणं' इति पाठः।