अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४३ {' '} 205 पूर्वोक्त अङ्क संख्या में नख (20) अङ्ग (9) अर्कगण से चैत्रादि युक् तीन स्थानों पर स्थापित करें और नन्द (9) युग्म (2) यम (1) फल वेद (4) गुण (3) घटाकर (पातं) आठ जोड़ दें। इसके बाद, शून्य, राम, इन्दुभि (130) भागों को जोड़ देने से प्रथम फल आता है। पुनः अनष्ट करे, शेष ? पञ्चराम निशाकर (135) मान के घन नष्टहीन साठ भागों में शेष को ऋण करें।¹ अमावास्या ध्रुवकस्य मासे मासे तथा पुनः ।² चारुभद्र ध्रुवकमासे द्विधा द्विरामधना ? ॥ 9 ॥ वेदान्वेन्दुभिर्भागैः फलोनेक षष्टिभाग- घटिकामाप्रोति तिथि विज्ञेय फलमासगुणामिश्रितः ? ॥ 10 ॥ अमावस्या ध्रुवक संख्या प्रति मास अर्थात् हर एक मास में पुनः बारम्बार चारुभद्र ध्रुवक मासों में दो प्रकार से द्विर्राम (6) अथवा (32) धन बना ? वेदान्वेन्दु भिर्भागै (194) भागों में फलाने से षष्टिभाग (60) भाग की घटिका (आप्रोति) आती है, इसको तिथि कहते हैं, जिसमें फल मास गुणा मिश्रित (312) होगी। सप्तमे स्थितारन्येन्द्र वार उदये यमहरे मासगणे ?। द्विसङ्गच्छेद्धिसार्धभाग पिण्डामग्रिलबुद्धाद्विके। युक्तोवसयमसेसा ?³ ॥ 11 ॥ इति नष्टध्रुवकायनम् । इसी प्रकार सातवें अन्य इन्द्रादि से वार उदय होते हैं, यम हरे मासगणे ? दो के साथ ढाई भाग को पिण्ड अर्थात् मिलाकर अग्नि (3) लव आदि युक्तो वस यम सेसा ? होता है। अमावास्या ⁴ध्रुवमासे मासे मासे तथा पुनः। एवं युक्तिर्विधातव्या वर्तते चाङ्गवासना ॥ 12 ॥ मास-मास में अमावस्या को ध्रुवक मानें और इसी युक्ति से वासना अङ्गों का विचार किया जाता है।
- पाठ भ्रष्ट होने से यह अर्थ अस्पष्ट है, केवल शब्दार्थ मात्र किया गया है। यदि 'चैत्रादियुक्' पाठ माना जाए तो मकरन्द (बृहद्दैवज्ञरंजनम् 4, 12-13) की तरह की गणित हो सकती है।
- 'अमास्या ध्रुवस्य माध्यं मासे तथा पुनः। एवं युक्ति विधातव्या वर्तेपेत्येवांग वासना॥ कंसभद्रधूकमासं द्विधारामध्वाना इन्दुभिभागैः फलैःनि कष्टीभाग घटिका प्रोतिथी यज्ञेफल मासगुणामिश्रित।' इति न. पाठः।
- 'सप्तासा सत्तारख्ये द्वार सदयेवसहाय। मासगणे द्विसंगस्थे सिद्धाभागपिडांग्रिलबुध्वा। द्विके युक्ते वसुव मास सा। इति नष्टध्रुवकामयंत।' इति न. पाठः।
- 'ध्रुवमासे न मासे मासे तथा पुनः। एवं युक्तिविध्यातवर्तावेत्पज्ञाङ्गवासिनी।' इति न. पाठः।