अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 253, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें206 अपराजितपृच्छा एकोत्तरे ध्रुवमध्ये द्वात्रिंशद् घटिकायुतम् । पक्षपिण्डं च युग्मर्क्षं घटिके चन्द्रसङ्ख्यया¹ ॥ १३ ॥ इस अमावस्या से अमावस्या तक के स्थिर मान में ध्रुवमध्य से साठ घटिका युक्त दो पक्ष पिण्डों मे चौपन (युग्मर्क्षे) घटिका की चन्द्रसंख्या होती है। प्रथमं स्थापयेद्वारं वारघट्यस्तदूर्ध्वतः । पिण्डकेषु अधरताच्च ऋक्षं च घटिकार्धतः ॥ १४ ॥ पहले वार लिख कर स्थापित करें, उस वार की घटिका उसके ऊपर की ओर लिखें, इन दोनों के पिण्ड के नीचे नक्षत्र और उनकी घटिका आधी घटिका तक लिखें। एवं भुक्ती रवेः ख्याता सङ्क्रान्त्याद्युपलक्षयेत् । एषा त्वन्तरयुक्तीश्च लक्ष्याः पञ्चाङ्गवासनाः ॥ १५ ॥ इस युक्ति से सूर्य की संक्रान्ति आदि उपलक्षित होती है। इस प्रकार की अन्तर युक्तियों को लक्ष्य में रखकर पञ्चाङ्ग-वासना का विचार किया जाता है। मासान्ते पूर्वध्रुवके योज्याऽमावास्यिकान्ततः । वारसप्तभागं त्यक्त्वा घटिकाः षष्टि वारोच्यते ॥ १६ ॥ मास के अन्त में पहले के स्थिरमान ध्रुवक अङ्क में इनको अमावस्या के अन्त तक जोड़ कर सात भागों में वार को छोड़कर साठ घटिका को वार कहते हैं। एवं वारो ध्रुवे साध्यो घटिकाः षष्टिरग्रतः । अष्टाविंशतिभिर्भाग्यं शेषैः स्याद् ध्रुवसाधका ॥ १७ ॥ इस प्रकार फिर वार स्थिर हो जाने पर आगे भी साठ साठ घटिका साधते जाए और अट्ठाईस से भाग देकर शेष को ध्रुव-स्थिर साधक बनाएँ। अमावास्या ध्रुवमासे मासे मासे तथा पुनः । एवं युक्तिर्विधातव्या वृत्ता पञ्चाङ्गवासना ॥ १८ ॥ इस तरह अमावस्या को ध्रुवक बनाकर प्रतिमास इसी तरह करते हुए आवृत्ति से पञ्चाङ्ग-वासना का विचार किया जाता है। सप्तविंशतिभागैस्तु घटिकाः षष्टिरेव च । एवमृक्षं साध्यं घटिकाषष्टिरग्रतः ॥ १९ ॥ सताईस भागों की साठ घटिकाओं वाले नक्षत्रों को स्थिर अङ्क साध्य बनाकर आगे की घटिका षष्टि इसी तरह बनाएँ।
- 'वेकोतार ध्रुवकामध्या योज्या द्वाविंशघटिका युतां। क्षययन युग्मं रक्षं घटिकाचन्द्रसंख्यया' इति न. पाठः ।