अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४१ 195 ब्रह्मादिस्थानपञ्चकं द्विभक्तं चाङ्कितं त्रिधा। अष्टतङ्गुलं कार्यं चतुर्था द्वादशाङ्कितम् ॥ २५ ॥ ब्रह्मा से आरम्भ होने वाले स्थान पञ्चक को दो भागों में बाँटे और अष्टम स्थान को तीन भाग में बाँटे तथा बारहवें अङ्गुल स्थान को चार भाग में बाँटकर अङ्कित कर देना चाहिए। इत्युक्तमानप्रमाणं प्रयुक्तं वास्तुवेदिभिः । वास्तोरुत्तरपार्श्वेऽर्च्यं कम्बिकाकलशादिकम् ॥ २६ ॥ इस प्रकार मान प्रमाण को वास्तुशास्त्र के विद्वानों ने प्रयुक्त किया है। इस कम्बिका- गज की और कलशों की वास्तु के उत्तर की ओर स्थापना करके पूजा करनी चाहिए। आच्छादयेद्वस्त्रयुग्मैः कम्बिकां कलशांस्तथा । सुगन्धधूपपुष्पैश्च देवतार्थार्नादिकैः ॥ २७ ॥ इसके बाद, दो वस्त्रों से कम्बिका-गज और कलश को अलग-अलग ढक दे और सुगन्धित धूप, पुष्पों से देवताओं का पूजन, अर्चादिक करें। समुद्धरेत् पूजयित्वा स्तोत्रैर्याम्यकरोत्तमैः । उच्चाटनं व्याधी रोगस्तथा सन्तापकारणम् ॥ २८ ॥ अग्निभयं प्रजापीडा मृत्युर्व्याधिः पुनस्तथा । निधनं नरकपातं रुद्रादि विष्णुतुस्तथा ॥ २९ ॥ इसी प्रकार स्तोत्र का पाठ करते हुए दाहिने उत्तम हाथ से उनको उठाएँ। कम्बिका-गज के रुद्र से आरम्भ करके ब्रह्मा भाग तक (पीड़ित होने पर) होने वाले विघ्न हैं— 1. उच्चाटन, 2. व्याधि, 3. रोग, 4. सन्ताप, 5. अग्निभय, 6. प्रजापीड़ा, 7. मृत्यु व्याधि, 8. निधन और 9. नरक में गिरना। एकाङ्गुलौ मानप्रयोग एवं सङ्ख्याशब्दादिकोत्तमः ? । पर्यायशब्दा व्यवहारयोगे समीरिताः सूत्रकलाप्रवीणैः ॥ ३० ॥ एक अङ्गुल से बनने वाले मान, माप का प्रयोग एवं शब्दादिकों के द्वारा समझी जाने वाली संख्या के उत्तम पर्याय शब्द जो व्यवहार में लाने के योग्य हैं, ऐसे सूत्र कला के प्रवीण विद्वानों ने निर्धारित किए हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां हस्तकम्बीप्रमाणाधिकारो नामैकचत्वारिंशत्तमं सूत्रम् ॥ 41 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में हस्तकम्बी प्रमाण अधिकार नामक इकतालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 41 ॥