अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें196 अपराजितपृच्छा गणितशब्दनिघण्टुर्नाम द्विचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४२ ॥ विश्वकर्मोवाच - शब्दा उक्ता अङ्गुलाद्या निघण्टौ भाषितानि च। भूयोजनप्रमाणानि प्रवक्ष्यामि यथार्थतः ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि निघण्टु में भाषित जो शब्द अङ्गुल से आरम्भ करके भूमि के योजन प्रमाणों के लिए कहे गए हैं, उनको मैं ठीक-ठीक तरह से कहता हूँ। अथाङ्कज्ञानमाह - क्ष्माक्षितितनुशब्दरूप-मन्त्रचन्द्राश्चैकपर्यायाः। पक्षयुग्मनेत्रद्वन्दगोलकं दस्त्राश्विन्यौविषाणचरणा द्वयोः ॥ २ ॥ एकादि संख्याओं के पर्यायार्थक शब्द क्रमशः ये हैं- संख्या 1 के लिए क्ष्मा, क्षिति, तनु, शब्द, रूप, मन्त्र और चन्द्रमा शब्दों का प्रयोग होता है। इसी प्रकार संख्या 2 के लिए - पक्ष, युग्म, नेत्र, द्वन्द, गोलक, हस्त, अश्विनौ, विषाण और चरण होते हैं। अग्नयो गुणरामाश्च कालसङ्ख्याविधिस्तथा। शक्तयो हरनेत्राणि त्रयाणां वाचका इमे ॥ ३ ॥ संख्या 3 के लिए अग्नि, गुण, राम, काल, संख्या, विधि, शक्ति-त्रिशूल, हरनेत्र - इतने तीन के पर्याय हैं। कृतकोणयुगविध्यास्य तुर्याम्बुधि दिग्विदिग्मङ्गला। गोचरणमार्गाख्यातं भागाः श्रुतयश्च सङ्ख्या चतुर्णाम् ॥ ४ ॥ संख्या 4 के लिए कृत, कोण, युग, विधिमुख या आस्य, तुर्य, अम्बुधि, दिक्- विदिक्, मङ्गल, गोचरण, मार्ग, भाग, श्रुतियाँ— ये संख्या चार के पर्याय हैं। इषुविषयतत्त्वेन्द्रियधृषण ? (स्वर्द्रु !)शम्भुवक्त्र क्षेत्राणि। वास्तुलिङ्ग प्रतीता हत ? (व्रत !)भवमुखानि च पञ्चानाम् ॥ ५ ॥ संख्या 5 के लिये इषु, विषय, तत्त्व, इन्द्रिय, (धृषण ? स्वर्दु), भूषण, शम्भुवक्त्र, क्षेत्र, वास्तुलिङ्ग, प्रतीत, हत ? भवमुख - ये पाँच के पर्याय हैं। गायत्रीदर्शनखण्डरसर्तुयान कर्णिक ? ( कोणक! ) रागषण्मिश्रम्। द्विशक्ति काणगण रत्नशक्त्या ननामृत ग्रन्थ स्कन्दवक्त्रं षण्णाम् ॥ ६ ॥ संख्या 6 के लिए गायत्री, दर्शन, खण्ड, रस, ऋतु, यान, कर्णिक ? (कोणक), राग, षण, मिश्र, द्विशक्ति, काणगण, रत्नशक्ति, नानामृत, ग्रन्थ, स्कन्दवक्त्र (कार्तिकेय के मुख, षडानन) - इतने छह संख्या के पर्याय हैं।