अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४० 187 हेमजैर्विमलैः पीडा ह्युदितं च त्रिधा क्रमात् ॥ 10 ॥ जिस शिला में लोहज विमल पाया जाए, उससे दुर्भिक्ष होता है। जिसमें कांस्य विमल पाया जाता हो, उससे अनावृष्टि और हेमज विमल से पीड़ा पैदा होती है। इसी प्रकार इन तीन दूषित शिलाओं को फल सहित क्रम से कहा गया। छेदनावसरेमण्डलादीनां दर्शनफलं — छेदने च कृते तस्या मण्डलं यत्र दृश्यते। तद् गर्भितं विजानीयात् जीवशिल्प-विचक्षणः ॥ 11 ॥ जिस शिला के छेदन करते समय मण्डल बन जाते हों, उस शिला को गर्भित समझना चाहिए, ऐसा जीव-शिल्प के जानकार विद्वानों ने कहा है।¹ माञ्जिष्ठे चैव मण्डूको हरिते कर्कटो भवेत्। पीते गोधा विजानीयात् कृष्णे विद्याद् भुजङ्गमम् ॥ 12 ॥ ऐसी गर्भित शिलाओं के रङ्ग भेद से भी विविध जीवों के होने के सङ्केत मिलते हैं जैसे मञ्जिष्ठ रङ्ग की शिला में मेंढक होगा और हरित वर्ण की शिला में केंकड़ा पाया जाएगा। पीले रङ्ग की शिला में गोह या गोधा का होना जाने जबकि काले रङ्ग की शिला में भुजङ्ग की स्थिति होती है। पतिले मूषको ज्ञेयः कृकलासश्च श्यामके। अतिरक्तेन वर्णेन चेन्द्रगोपकामादिशेत् ॥ 13 ॥ इसी प्रकार से पतिल वर्ण की शिला में मूषक जाने, श्याम वर्ण की शिला में कृकलाश या करगेंटिया अथवा गिरगिट और बहुत ही लाल वर्ण की शिला में इन्द्रगोप या वीरबहूटी (रामजी की गाय, मखमली जीव जो सावन के दिनों में खेतों में रक्त के छींटों की तरह दिखाई देता है) जाने। किंशुकाभे तु खर्जूरोऽतसीपुष्पे पिपीलिकाः। गुडवर्णे तु पाषाणं कूर्म स्यादापसन्निभे ॥ 14 ॥ पलाश के पुष्पों जैसी दिखाई देने वाली शिला में बिच्छू होगा और अलसी के पुष्पों जैसी प्रतीत होने वाली शिला में चींटियाँ होंगी और गुड़ के रङ्ग वाली शिला में पानी के साथ कछुआ हो सकता है। भस्माभे तिमिरी ज्ञेयो वारला श्वेतभस्मभे। विचित्रे वृश्चिकं विद्यात् खद्योतं मधुवर्णके ॥ 15 ॥
- यहाँ ग्रन्थकार का निश्चय ही सङ्केत जीवाश्म या फॉसिल्स की ओर है। पाषाणों में ही पूर्वकाल में जीवों के जीवन के लक्षण मिलते हैं।