अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें186 अपराजितपृच्छा करके उस शिला में पुरुषाकृति में (किस दिशा में सिर और किधर पैर होंगे, ऐसा देखकर) आकार के हेतु छेद करता जाए। शिलालक्षणं, युवावृद्धाबालावयपरीक्षणम् — निबिडा निर्व्रणा तीव्रगम्भीरमधुरान्विता । शीतला च सुगन्धा च मृद्वी तेजसमन्विता ॥ ५ ॥ अब योग्यायोग्य शिलाओं के गुण के बारे में कहता हूँ¹— शिला निविडा हो अर्थात् गाँठ-गठीली न हो, निर्व्रणा हो अर्थात खाड़े खोचर युक्त न हो, तीव्र मधुर गम्भीर ध्वनि देने वाली हो अर्थात अच्छी टङ्कार ध्वनि वाली हो, ठण्डी हो, सुगन्ध वाली हो, मृदु हो, घड़ाई में सरल हो, तेज युक्त हो अर्थात आकर्षक हो। युव नाम्नी शिला ज्ञेया सर्वकामफलप्रदा । पूजिता सर्वलिङ्गेषु ह्यर्चंना सर्वशोभना ॥ ६ ॥ ऐसी शिला को युवा नाम की शिला कहते है जो सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाली होती है। यह सभी लिङ्गों के निर्माणार्थ पूजित होती है और सभी अर्चाओं, मूर्तियों के निर्माण में भी सब तरह से शोभायमान होती है। मत्स्यमण्डूकतरला यैतैश्चिन्हैः प्रदृश्यते । वृद्धा सा तु शिला ज्ञेया सर्वकार्यविनाशिनी ॥ ७ ॥ जिस शिला में मत्स्य, मेंढक और तरला या लहरों के चिह्न दिखाई देते हों, उस शिला को वृद्धा समझना चाहिए। यह सभी कार्यों में विनाशकारी है। अतिमृद्वी भवेद् बाला मन्दपुष्पकवेष्टिता । टङ्काघातैः साधनीया छेदाद्यं च परीक्षयेत् ॥ ८ ॥ जो शिला बहुत मृदु या नरम हो, वह बाला शिला होती है। यह मन्दपुष्पों से ढकी हुई होती है। इसको टाँकी के आघात, छेदादि करके परीक्षा करने के बाद ही उपयुक्त हो तो काम में लिया जा सकता है। विमलैर्दूषिता या तु वर्जयेत्तां शिलां बुधः । विमलं त्रिविधं ज्ञेयं लोहकांस्यजहेमऽम् ॥ ९ ॥ जो शिला विमलों से दूषित होती है, उसे समझदार लोग काम में लाने से मना करते हैं। ये विमल तीन प्रकार के होते हैं- लोहज, कांस्यज और हेमज। लोहविमलैर्दुर्भिक्षमनावृष्टिश्च कांस्यजैः ।
- देवतामूर्तिप्रकरण और रूपमण्डनं में भी ये ही लक्षण आएँ हैं। इनका उत्स मयमतम् है।