अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४० 185 और ब्रह्म घोष के साथ लाकर उत्तर दिशा की ओर सम्भालकर उसको स्थान देना चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वनयात्राधिकारो नामैकोनचत्वारिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ३९ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वनयात्रा अधिकार नामक उनचालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥ वनयात्राशिलापरीक्षा नाम चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४० ॥ विश्वकर्मोवाच – लिङ्गार्चादिशिलानां च सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् । पूजा पूर्वविधानेन शिलोद्धारं तु कारयेत् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि अब लिङ्ग, अर्चा-प्रतिमादि में प्रयुक्त होने वाली शिलाओं केलक्षण कहता हूँ। शिलोद्धार हेतु अर्थात अर्चा, लिङ्गादि के निर्माण में काम आने वाली शिला को भूमि से निकालने के लिए पहले वृक्ष लाने में जो (पूर्व अध्याय में) पूजा विधान कहा गया, वैसा ही पूजा विधान