भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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184 अपराजितपृच्छा एवं शुभैश्च शकुनैः प्रविष्टो वनमध्यतः । वृक्षं सम्पूज्य तु करे कुठारं पूर्वतो धरेत् ॥ 24 ॥ इसी प्रकार कङ्कण, हार, केयूर, मुकुट, कुण्डलादि— इतने शकुन यदि दिखाई पड़े तो सर्वकामना की सिद्धि होती है। इस तरह के शुभ शकुनों को ध्यान में रखकर ही वन में प्रवेश करना चाहिए और पहले वृक्ष की अच्छी तरह पूजा सम्पन्न करके पूर्व दिशा की ओर मुँह किए हुए हाथ में कुल्हाड़े को ग्रहण करे। अयं मन्त्रः — ''तत आँ नमोरुद्राय पिङ्गलाय महात्मने । विश्वेदेवा विश्वरूप विश्वकर्मणे वै नमः''॥ 25 ॥ अनेन चैव मन्त्रेण कुठारमभिमन्त्रयेत् । तत्र क्षेत्रं बलिं दद्यात् समर्च्य सर्वदेवताः ॥ 26 ॥ इसके उपरान्त इस मन्त्र से कुल्हाड़े को अभिमन्त्रित करें— 'ॐ नमो रुद्राय पिङ्गलाय महात्मने, विश्वेदेवा विश्वरूप विश्वकमणे नमः।' इसके उपरान्त उक्त क्षेत्र के सभी देवताओं की ठीक तरह से पूजन करके बलि का चरु निवेदित करे। तदा च छेदयेद् वृक्षं पतितं चोपलक्षयेत् । ईशानोत्तरपूर्वे च सर्वकामफलप्रदम् ॥ 27 ॥ इसके बाद ही वृक्ष का छेदन करे और ध्यानपूर्वक यह भी देखें कि वृक्ष कटकर किस दिशा की ओर गिरता है? यदि कटा हुआ वृक्ष ईशान कोण अर्थात् उत्तर पूर्व की ओर गिरे, तो इसे सर्वकामफलप्रद समझना चाहिए। अशुभश्चान्यदिशायां शाखापातस्तथोच्यते । दिशायां चाप्रशस्तायां तच्छाखां वर्जयेद् बुधः ॥ 28 ॥ अन्य दिशाओं में वृक्ष की शाखाओं का गिरना अशुभ कहा गया है। जो शाखाएँ अप्रशस्त दिशाओं की ओर गिरी हों, उन शाखाओं को काम में लेना विद्वानों¹ ने वर्जित किया है। एवं संगृह्यते वृक्षमानयेन्नगरादिके। वेशयेदुत्तरदिशि वादित्रैर्ब्रह्मघोषकैः ॥ 29 ॥ इस प्रकार की सावधानीपूर्वक संग्रह किए हुए वृक्ष को नगर में गाजे-बाजे

  1. यह विधि समराङ्गणसूत्रधार, विश्वकर्माप्रकाश, मयमतम्, मानसार, ईशानशिवगुरुदेवपद्धति, शिल्परत्नम्, वास्तुमण्डनम् आदि में भी आई है।