अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 230, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-३९ 183 तैलाभ्यक्तस्तथाहिश्च मुक्तकेशाः स्त्रियस्तथा। काष्ठभारं चाग्रहीनं विधवा गुरुषादिकम् ? ॥ १८ ॥ उल्कापातो दिशादाहो महावातप्रवर्तनम्। तारापातोऽशनिघातः परितः पांशुवर्षणम् ॥ १९ ॥ एतेषु दृश्यमानेषु च भविष्यन्ति वै श्रियः। न गच्छेत् पदमेकं तु यदीच्छेच्च निवर्तनम् ॥ २० ॥ अशुभनिमित्त के विषय में कहा जा रहा है। तैलाभ्यङ्ग किए हुए, सर्प, खुले केश वाली स्त्री, लकड़ी का भार लिए हुए सामने आता, आगे से हीन, विधवा, गुरुघाति, उल्कापात, दिशाओं का दाह, झंझावात चलना, तारा टूटना, गाज गिरना, इसके उपरान्त पत्थर बरसना— ऐसा यदि सामने दिखाई पड़े तो समझना चाहिए कि भला नही होने वाला है।¹ उपर्युक्त अपशकुन होने पर कहीं बाहर जाना हो तो भूल कर भी एक भी कदम आगे न बढ़ाएँ यदि इन अपशकुनों का निवर्तन करना चाहते हों तो। मेघगर्जनवृष्टी च मत्स्योदयानि शोभनम्। अन्तरिक्षे भवेच्छेदः फलपुष्पनिपातनम् ॥ २१ ॥ वायुकां सुरङ्गिकं वागि वामे वृक्ष्याग्रसंस्थिताम् ?। कौशिको वामतः श्रेष्ठो ह्यशुभो दक्षिणै तथा ॥ २२ ॥ इसी प्रकार यदि मेघ गर्जन के साथ वृष्टि होती हो, मीन राशि आदि का शुभ उदय हो, अन्तरिक्ष में छेद हो और उससे फल तथा पुष्प गिरते हों। वायुका सुरङ्गिक वागी (शकुन चिड़िया) वामभाग में वृक्ष पर बैठी हो, कौशिक या उल्लू बायीं ओर श्रेष्ठ और दक्षिण और अशुभ है। कङ्कणं हारकेयूरौ मुकूटं कुण्डलादिकम्। एतेषु दृश्यमानेषु सर्वकामफलं भवेत् ॥ २३ ॥
- वराह का मत हैं कि यात्रा में कपास, औषध, काला अन्न, नमक, नपुंसक व्यक्ति, अस्थियाँ, ताल- हरताल, अग्नि, साँप, कोयला, विष, कङ्गुली, मल, छुरा, रोगी, वमन करने वाला, पागल, पक्षाघातपीड़ित, अन्धा, तृण, तुस-भूसी, क्षुधापीड़ित, तक्र, शत्रु, मुण्डित सिर, तेल लगाया व्यक्ति, खुले केश वाला, पापी, लाल कपड़े पहने व्यक्ति आदि अशुभ होते हैं— कार्पासौषधकृष्णधान्यलवणक्लीबा- स्थितानलं सर्पाङ्गारगराहिचर्मशकृतः केशारिसव्याधिताः। वातोन्मत्तजडान्धकतुणतुष क्षुत्क्षामतक्रारयो मुण्डाभ्यक्तविमुक्तकेशपतिताः काषायिणश्चाशुभाः ॥ (बृहद्योगयात्रा 27, 6; योगयात्रा 13, 14 एवं लघुटिकिनिका 9, 15)