भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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182 अपराजितपृच्छा वन में जाते समय वायु प्रवाह पर विचार करना अपेक्षित है। ईशानकोण के अन्त से जब ध्वनि करती हुई जोर की हवाएँ बहती हुई आती है और उनके साथ अन्य हवाएँ भी आहत होती हो तो यह अनुचित और अशुभ है। सुप्रदेशाः सुसङ्ग्राह्याः सर्वकामफलप्रदाः । अप्रशस्ता अन्यकाले निमित्तं चोपलक्षयेत् ॥ 13 ॥ जहाँ-जहाँ सुप्रदेश पाए जाएँ उन्हें सुसंग्रह पूर्वक ग्राह्य किया जाए जिससे सभी कामनाओं की शुभफलप्रद पूर्ति होती है तथा जो भी अप्रशस्त प्रदेश हों, उन्हें अन्य काल के निमित्त शकुन हेतु भी दरगुजर कर देना चाहिए। दिव्यानि चैव भौमानि शुभानि चाशुभानि च । प्रशस्तानि शुभान्यत्र चाशुभानि विवर्जयेत् ॥ 14 ॥ दिव्यों की, देवातादिकों की भूमि शुभ और अशुभ होती है उनमें वही प्रशस्त हैं जो शुभ है, परन्तु जो अशुभ हो उन्हें छोड़ देना चाहिए। नानाविधानिमित्तानि — निमित्तानि गजश्चाश्वो वृषभश्च रथो विदुः । घृतं पुष्पाक्षते विप्रः कन्या रम्भा च गौर्मृगः ॥ 15 ॥ शतपत्रं च वैश्या च नृपः कुम्भश्च दीपकम् । वस्त्रयुग्मं फलं छत्रं यानं झम्पानमासनम् ॥ 16 ॥ वसुन्धरा धृत्यमानाय ? बहलं धान्यं पत्रादिकम ? । एतेषु दृश्यमानेषु निष्पत्तिः सुश्रियस्तथा ॥ 17 ॥ अब यात्राकाल में होने वाले निमित्तों या शकुनों के बारे कहता हूँ। गज, अश्व, वृषभ, रथ, विद्वान, घृत, पुष्प, अक्षत, विप्र, कन्या, केला, गाय, मृग, शतपत्र या तुलसीपत्र, वैश्या, राजा, घट, दीपक, दो वस्त्रों की जोड़ी, फल, छत्र-यान, पङ्खा, आसन, वसुन्धरा, धृतिमान, बहुत धान्य पत्रादिक- यदि ये सब यात्रा काल में दिखाई पड़े, तो अच्छे शकुन या श्रीवृद्धिकारक समझना चाहिए।¹

  1. पूर्वोक्त शकुन काश्यपशिल्पम्, समराङ्गण आदि में भी आए हैं। ये श्रीपति के मत से तुलनीय है— भृङ्गाराञ्जनवर्द्धमान मुकुराबद्धेकपञ्चा मिषोष्णीष क्षीरनुयानपूर्ण कलशच्छत्राणि सिद्धार्थकाः । वीणाकेतनमीनपङ्कज दधिक्षौद्राय्य गोरोचनाः कन्याशङ्खसितोक्ष वस्तुमनोविप्राश्चरत्नानि च ॥ प्रज्वलज्वलनदन्ति तुरङ्गाभद्रपीड गणिकाङ्कुशमृत्स्नाः । अक्षतेक्षुफलचामरभक्षाण्यायुधानि च भवन्ति शुभानि ॥ भेरिमृदङ्ग मृदुमर्दल शङ्खवीणा वेदध्वनिर्मधुरमङ्गलगीतघोषाः । पुत्रान्विता च युवतीः सुरभिः सवत्सा धौताम्बरश्चरजकोऽभिमुखः प्रशस्तः ॥ (ज्योतिषरत्नमाला 15, 62-64)