भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-३९ 181 जिन देशों में विरले वनों के समूह स्थित है, उन्हें उपवन समझना चाहिए। इनसे जलाऊ लकड़ी के पेड़ तथा वहाँ स्थित खदानों से शिलाएँ ली जा सकती हैं। कीर्तिमान् कीर्तयेद्यत्र रोप्यमाना द्रुमैर्लताः। काननं तच्च विज्ञेयं नृपक्रीडनहेतुकम् ॥ ६॥ जिन प्रसिद्ध वनों में द्रुम, लतादि का रोपण किया गया हो और जिनको राजाओं की क्रीड़ा के लिए यथा मृगया, आखेटादि के लिए छोड़ा गया हो, उन वनों को कानन कहते हैं। क्रमागतं शम्भुभवं वनोपवनकाननम्। वनयात्रा तु कर्तव्या तेषां कूलसमाश्रितैः ॥ ७॥ इन वन, उपवन और काननों में क्रमशः शम्भु, शिव की स्थापना करनी चाहिए और इन वन, उपवन, काननों के किनारे इन शिव स्थानों की स्थापना करके वहाँ इनके दर्शनार्थ वनयात्राएँ करना भी परम कर्त्तव्य समझना चाहिए। योग्याः प्रासादप्रतिमालिङ्गगेहादिके तथा। प्रशस्ता दारुशैलाश्र ग्राह्या यत्र सदा स्मृताः ॥ ८॥ इन स्थानों में योग्यतानुसार प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, गृहादि प्रशस्त माने गए हैं। इनके निर्माण के लिए सदा ही पाषाण और पेड़, काष्ठादि ग्राह्य माने गए हैं। अशोकशोकखदिराः कदम्बा देवदारवः। श्रीपर्णास्तिनिशाश्चैव सरलाश्चन्दनास्तथा ॥ ९॥ भूर्जत्रिमिसश्रेण्यश्च ? शाल्मलीरक्तचन्दनाः। अन्येऽपि बहवो वृक्षा महत्यश्च शिलास्तथा ॥ १०॥ इनके योग्य वृक्षों में अशोक, शाक, खदिर, कदम्ब, देवदारू, श्रीपर्ण, तिनिश, सरल, चन्दन, भूर्ज, त्रिमिस, श्रेणी, शाल्मली, रक्तचन्दन आदि अन्य भी बहुत से वृक्ष हैं। महान शिलाएँ भी ग्राह्य हैं। संछन्ना बहुभिः पत्रैः प्रदेशा यत्र संस्थिताः। सरित्तीरं समाश्रित्य रविरश्मिविवर्जिताः ॥ ११॥ (शिला, काष्ठ ग्रहणावसर पर यह विचारणीय है कि) जिस स्थान के प्रदेश पूरी तरह बहुत से पत्रों से ढके हुए हों और नदी के किनारे के स्थान हों जहाँ इतनी छाया हो कि सूर्य की किरणें भी भूमि पर नहीं पहुँच पाती हों। ईशान्यन्त वादिनेत्रं पूर्ववातैः प्रपादिताः। अन्यवातैर्हताह्येषु अप्रशस्ताः शुभप्रदाः ? ॥ १२॥