अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें180 अपराजितपृच्छा आत्रिकूटं हिमाद्यन्तं योजनैः शतपञ्चभिः । पूर्वापरौतोयनिधी हिमदण्डश्च भारते ॥ १९ ॥ आत्रिकूट अर्थात् त्रिकूट से लेकर हिमालय के अन्त तक की लम्बाई पाँच सौ योजन की कही गई है और पूर्वा-पर स्थिति में तोयनिधि, समुद्रपर्यन्त फैलकर भारतवर्ष के लिए एक हिमदण्ड अर्थात् हिमालय की दीवार बनकर खड़ा है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां भरतक्षेत्रग्रामसङ्ख्यानृपराज्यप्रमाणसङ्ख्याधिकारो नामाष्टात्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ३८ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में भरत क्षेत्र की ग्राम संख्या, नृपराज्य प्रमाण संख्या अधिकार नामक अड़तीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥ वनयात्रानामैकोनचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ३९ ॥ विश्वकर्मोवाच — मेरुश्च मन्दरश्चैव पर्वतो गन्धमादनः । हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नील एव च ॥ १ ॥ श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव महाशैलाः प्रकीर्तिताः । एते पर्वतराजाश्च महावननदीभवाः ॥ २ ॥ विश्वकर्मा बोले कि मेरु, मन्दर, गन्धमादन, हिमवान, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत, शृङ्गवान आदि सब महाशैल कहे गए हैं। ये सभी पर्वतराज हैं और इनसे महावन और महानदियाँ उत्पन्न हुई हैं। महेन्द्रौ मलयश्चैव महाविन्ध्यस्तथैव च । हिमाद्रिः पारियात्रश्च श्रीशैलश्च तथाऽर्बुदः ॥ ३ ॥ महावनानि ख्यातानि शृणु चोपवनानि च । त्रिधोदितं च क्रमतो वनोपवनकाननम् ॥ ४ ॥ महेन्द्र, मलय, महाविन्ध्याचल, हिमाद्रि, पारियात्र, श्रीशैल तथा अर्बुद ये सब महावनों के लिए विख्यात है। अब उपवनों के विषय में सुनो, जो कि तीन प्रकार के हैं। यथा— 1. वन, 2. उपवन और 3. कानन। उपवनदीनां लक्षणं — यत्र देशाश्च विरला वनकूलेषु संस्थिताः । उपवनानि ज्ञेयानि येषु ग्राह्या द्रुमाः शिलाः ॥ ५ ॥