अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र- ३८ <span style="float: right;">179</span> महापर्वताश्रिताश्च सजलाशयवर्तिनः । पर्वतार्णवमध्यस्थाः सजला देशसम्भवाः ॥ 12 ॥ इस हिमालय महापर्वत के आश्रय में अनेकों सजल जलाशय है इसलिए यह भारत वर्ष हिमालय पर्वत और सागर के मध्य एक बहुत ही सम्पन्न सजल देश सम्भव हो सका है। सिन्धुसागरतो देशाः काश्मीरान्ता जलैर्युताः । गौडबङ्गकामरूपाः सजलाः कार्तिकेश्वरे ॥ 13 ॥ इसी के फलस्वरूप सिन्धुसागर तक के देशों से लेकर काश्मीर के अन्त तक के देश सभी पूर्णतः जल से सम्पन्न है और गौड़, बङ्ग, कामरूप, कार्तिकेश्वर आदि भी सजल, सम्पन्न क्षेत्र है। महापर्वताश्रमा वै हिमाद्रौ गन्धमादने । श्वेतशृङ्गे हेमकूटे नीलनिशधमन्दरे ॥ 14 ॥ इस हिमालय महापर्वत में अनेकों आश्रम है जिनमें गन्धमादन, श्वेतशृङ्ग, हेमकूट, नील, निष