भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 225

178 अपराजितपृच्छा दक्षराज्ये सार्धसप्तलक्षाणि चैव सङ्ख्यया। अष्टादश च लक्षाणि सहस्राणि द्विनवतिः ॥ ५ ॥ उज्जयिन्यां वै सपादलक्षाणि च स्वयम्भरे। ललाटे गुर्जरे कच्छे सौराष्ट्रे लक्षकद्वयम् ॥ ६ ॥ दक्षराज्य में ग्रामों की संख्या साढ़े सात लाख है और उनसे होने वाली आय भी साढ़े सात लाख ही है। उज्जयिनी के ग्रामों की संख्या अठारह लाख है और आय भी अठारह लाख है। स्वयम्भर (साम्भर) राज्य की ग्राम संख्या सवा लाख है तथा लाट, गुर्जर, कच्छ और सौराष्ट्र की ग्राम संख्या दो-दो लाख है। सार्धत्रयं मरुकोटे लक्षाणां मरुमण्डले। सिन्धुसागरदेशे तु सार्धलक्षत्रयं स्मृतम् ॥ ७ ॥ मरुकोट के ग्रामों की संख्या साढ़े तीन लाख है तथा मरुमण्डल, सिन्धुसागर देश के ग्रामों की संख्या भी साढ़े तीन लाख मानी गई है। खुरषाणे चत्वारिशल्लक्षाणि च तथैव च। त्रिगर्तके द्विलक्षाणि तथा ग्रामास्तु सङ्ख्यया ॥ ८ ॥ खुरासान के ग्रामों की संख्या चार लाख है तथा इसी तरह त्रिगर्त के ग्रामों की संख्या दो लाख है और उनके आय भी उतनी ही है। सूर्यलक्षाण्यहिराज्ये षट्सार्धानि गुडाद्वीपे। जलन्धरे सार्धत्रयं तथा लक्षाणि सङ्ख्यया ॥ ९ ॥ अहिराज्य की ग्राम संख्या बारह लाख और गुडाद्वीप की साढ़े छह लाख, जालन्धर की साढ़े तीन लाख है। ग्रामाः षष्टिसहस्राणि तथा षष्टिशतानि च। षष्टित्रयस्तथा चैव चेत्थं काश्मीरमण्डलम् ॥ १० ॥ स्त्रीराज्यं च त्रिकूटाख्यं काश्मीरपूर्वगणाधिपः ?( पञ्चलक्षाधिश्च ) ।¹ हिमवान् दण्ड आख्यातो वर्षे भारतके तथा ॥ ११ ॥ काश्मीर मण्डल के ग्राम साठ हजार, साठ सौ तिरसठ है। काश्मीर के पूर्व में त्रिकूट नाम का स्त्री गणराज्य है जहाँ स्त्रियाँ ही राज करती है। यही हिमवान् अर्थात् हिमालय पर्वत भारतवर्ष की दण्डमान दीवार की तरह स्थित है।

  1. 'पञ्चलक्षाधिश्च' इति स्यात्। तथा च स्कन्दपुराणे माहेश्वरखण्डे— पञ्चलक्षाश्च ग्रामाणां स्त्रीराज्यं परिकीर्तितम ॥ ( कुमारिकाखण्ड 39, 53)