भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 259

चन्द्रभुक्तेर्मध्यतश्च रथे( थ ) युक्तिं विशोधयेत् । चन्द्रसूर्यर्क्षमेकत्र योगसङ्ख्या ह्यनुक्रमात् ॥ ५२ ॥¹ इति योग आनयनाधिकारः। चन्द्र भुक्ति के मध्य और रथ युक्ति को विशोधित करें। इस तरह से चन्द्र, सूर्य, नक्षत्रों को एकत्र करके योग संख्या अनुक्रम से होती है। करणाधिकारः — साध्यां तिथिं च द्विःकृत्य तदेक तु परित्यजेत्। सप्तभिस्तु हरेद्भागं शेषं करणमुद्धरेत् ॥ ५३ ॥ इति करणाधिकारः। (शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से आरम्भकर) साध्य तिथि को दो से गुणा करें तथा गुणनफल में से एक घटाकर शेष में सात का भाग देने से बवादि करण निकल आते हैं। (इनके नाम है—1. बवकरण, 2. बालवकरण, 3. कौलवकरण, 4. तैतिलकरण, 5. गरकरण, 6. वणिजकरण और 7 विष्टिकरण ।²) सप्तैव₇ करणाः ख्याताः वाराः सप्तैव₇ कीर्तिताः । तिथय पञ्चदश₁₅ च योगर्क्षं सप्तविंशतिः₂₇ ॥ ५४ ॥ ज्योतिष की मान्यताओं में उपर्युक्त सात करण प्रसिद्ध हैं, सात ही वार (रवि से शनि तक), पन्द्रह तिथियाँ (प्रतिपदा से अमावस्या या पूर्णिमा तक), योग और सत्ताईस नक्षत्र (विष्कम्भादि एवं अश्विन्यादि) हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां ज्योतिषपञ्चाङ्गवासनाधिकारो नाम त्रयश्चात्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४३ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ज्योतिषपञ्चाङ्गवासना अधिकार नामक तियालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥

  1. योग ज्ञात करने की रीति चण्डेश्वर ने इस प्रकार बताई है कि जिस दिवस को योग का ज्ञान वाञ्छित हो, उस दिन सूर्य जिस नक्षत्र में हो, उसकी संख्या और चन्द्रमा जिस नक्षत्र में हो उस नक्षत्र की संख्या को जोड़ें और उसमें से एक को घटाकर 27 से भाजित किए जाने पर जो शेष हो, उसे विष्कम्भादि क्रमानुसार योग जानना चाहिए— यस्मिन्नृक्षे स्थितो भानुर्यत्र तिष्ठति चन्द्रमाः । एकीकृत्य त्यजेदेकं योगा विष्कम्भकादयः ॥ (बृहद्दैवज्ञरञ्जनम् 25, 1)
  2. आचार्य श्रीपति का मत है— बवाह्वयं बालवकौलवाख्यं ततो भवेत्तैतिलनामधेयम् । गराभिधानं वणिजं च विष्टिरित्याहुरायाः करणाणि सप्त ॥ (ज्योतिषरत्नमाला 6, 1)