अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४४ 213 अवकहडाचक्रज्योतिषं चतुश्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 44 ॥ विश्वकर्मोवाच — आदित्यसोमभौमाश्च बुधश्चाथ बृहस्पतिः। शुक्रः शनिश्चरश्चैते सप्तसूर्यादिवासराः ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि सूर्य, सोम, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि— ये सब रविवार के क्रम से सातों वार होते हैं अर्थात् रविवार, सोमवार, मङ्गलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार और शनिवार हैं। तिथ्यादीनामाह — नन्दा भद्रा जया रिक्ता पूर्णा स्यात् पञ्चमी तथा। पञ्च पञ्च तथा पञ्च मासार्धेषु यथातिथि ॥ 2 ॥ तिथियों की संज्ञाओं में 1. नन्दा (1, 6, 11), 2. भद्रा (2, 7, 12), 3. जया (3, 8, 13), 4. रिक्ता (4, 9, 14) और पाँचवीं तिथि की संज्ञा 5. पूर्णा (5, 10, 30, 15) है। इस प्रकार पाँच, पाँच और पाँच मिलकर मासार्द्ध अर्थात् एक पखवाड़े की तिथियाँ होती है।¹ प्रतिपदषष्ठ्येकादशी नन्दा भद्रा द्व्यश्वार्ककाः। जया त्र्यष्टत्रयोदश्यो रिक्ता वेदाङ्कशक्रतः ॥ 3 ॥ प्रतिपदा, षष्ठि और एकादशी (1, 6, 11) को नन्दा तिथि कहा जाता है। द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी (2, 7, 12) को भद्रा तिथि कहते हैं। तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी (3, 8, 13) तिथियों की संज्ञा जया है और चतुर्थी, नवमी व चतुर्दशी (4, 6, 14) की संज्ञा रिक्ता है। पञ्चमी दशमी चैव पूर्णमासी तथैव च। एषा पूर्णा तिथिर्ज्ञेया दैवज्ञैर्जल्पिता हि सा ॥ 4 ॥ इसी प्रकार से पञ्चमी, दशमी व पूर्णमासी (5, 10, 15 तथा अमावस्या) को पूर्णा तिथि कहा जाता है, ऐसा ज्योतिषियों ने कहा है। अश्विनी भरणी चैव कृत्तिका रोहिणी तथा। मृगार्द्रे च पुनर्वसुः पुष्याश्लेषा मघा तथा ॥ 5 ॥ पूर्वोत्तरे च फाल्गुन्यौ हस्तश्चित्राथ स्वातिका।
- ज्योतिषरत्नमाला में कहा गया है — नन्दा च भद्रा च जया च रिक्ता पूर्णेति सर्वास्तिथयः क्रमात्स्युः। कनिष्ठमध्येष्ट फलास्तु शुक्ले कृष्णे भवत्युत्तममध्यहीनाः ॥ (तत्रैव 2, 4)