अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 261, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंविशाखानुराधाज्येष्ठा मूलं पूर्वोत्तराषाढे ॥ ६ ॥ श्रवणश्च धनिष्ठा च शतभिषा च पूर्विका। उत्तराभाद्रपदा च रेवती सप्तविंशतिः₂₇ ॥ ७ ॥ इति नक्षत्र नामानि। सत्ताईस नक्षत्र होते हैं — 1. अश्विनी, 2. भरणी, 3. कृत्तिका, 4. रोहिणी, 5. मृगशिरा, 6. आर्द्रा, 7. पुनर्वसु, 8. पुष्य, 9. आश्लेषा, 10. मघा, 11. पूर्वाफाल्गुनी, 12. उत्तरा, 13. हस्त, 14. चित्रा, 15. स्वाती, 16. विशाखा, 17. अनुराधा, 18. अनुराधा, 19. मूल, 20. पूर्वाषाढ़ा, 21. उत्तराषाढ़ा, 22. श्रवण, 23. धनिष्ठा, 24. शतभिषा, 25. पूर्वाभाद्रपद, 26. उत्तराभाद्रपद और 27. रेवती— इस प्रकार सत्ताईस नक्षत्र होते हैं। अथ योगनामानि — विष्कुम्भः प्रीतिरायुष्मान् सौभाग्यः शोभनस्तथा। अतिगण्डः सुकर्मा च धृतिः शूलस्तथैव च ॥ ८ ॥ गण्डो वृद्धिर्ध्रुवश्च व्याघातो हर्षणस्तथा। वज्रसिद्धी व्यतीपातो वरीयान् परिधः शिवः ॥ ९ ॥ सिद्धः साध्यः शुभः शुक्लो ब्रह्मेन्द्रौ वैधृतिः क्रमात्। सप्तविंशतिसङ्ख्याका योगाश्चन्द्रार्कयोगतः ॥ १० ॥ इति योगानामानि। (विष्कुम्भादि योग सत्ताईस होते हैं) 1. विष्कुम्भ, 2. प्रीति, 3. आयुष्मान्, 4. सौभाग्य, 5. शोभन, 6. अतिगण्ड, 7. सुकर्मा, 8. धृति, 9. शूल, 10. गण्ड, 11. वृद्धि, 12. ध्रुव, 13. व्याघात, 14. हर्षण, 15. वज्र, 16. सिद्धि, 17. व्यतीपात, 18. वरीयान्, 19. परिघ, 20. शिव, 21. सिद्धि, 22. साध्य, 23. शुभ, 24. शुक्ल, 25. ब्रह्म, 26. ऐन्द्र और 27. वैधृति। ये क्रम से सत्ताईस संख्यक योग चन्द्र और सूर्य के योग से बनते हैं। अथ करणनामानि — बवश्च बालवश्चैव कौलवस्तैतिलस्तथा। गरो वणिजविष्टी च सप्तकरणाभिधाः स्मृताः ॥ ११ ॥
- बवकरण, 2. बालवकरण, 3. कौलवकरण, 4. तैतिलकरण, 5. गरकरण,
- वणिजकरण और 7. विष्टिकरण ये चर करण होते हैं, ऐसा जाना जाता है।