अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४४ 215 अथावकहडाचक्रमाह - चुचेचोला चाश्विनी स्याल् लिलूलेलो भरण्यपि। कृत्तिका स्यादईऊए रोहिण्यूवाविवृ स्मृता ॥ 12 ॥ वेवोकाकी मृगश्चार्द्रा कूघाङछा प्रकीर्तिता। (अब राशि विचारार्थ नक्षत्र के चरणभेदानुसार उनके अक्षरों पर विचार किया जा रहा है) राशिचक्र में चू चे चो ला अश्विनी; लि ला ले लो भरणी नक्षत्र के अक्षर हैं। कृत्तिका के इ ऊ ए; रोहिणी के वा वि वु; मृगशिरा के वे वो का की और आर्द्रा नक्षत्र के कु घ ङ-छ अक्षर कहे गए हैं। केकोहाही पुनर्वसूर्हे॑देहोढा च पुष्यभम् ॥ 13 ॥ अश्लेषा तु डिडूडेडो मामीमूमे मघाह्वयम्। मोटाटीटू तु पूर्वाख्या मुफाटेटो पपि स्मृता ॥ 14 ॥ प्रोक्तः पूषणटो हस्तः पेपोरारी तु चित्रका। रूरेरोता तथा स्वाती तितूतेतो विशाखिका ॥ 15 ॥ इसी प्रकार के को हा ही पुनर्वसु के; हू हे हो ढा पुष्य; डि डू डे डो आश्लेषा; मा मी मू मे मघा; मो टा टी टू पूर्वाफाल्गुनी; मु फा टे टो उत्तराफाल्गुनी; पू ष णा टो हस्त; पे पो रा री चित्रा; रु रे रो ता स्वाती; ति तू ते ता विशाखा नक्षत्र के अक्षर हैं। अनुराधा ननीनूने ज्येष्ठा नोयायियुर्मता । तथा येयोभभी मूलं पूर्वाषाढा भुधाफढा ॥ 16 ॥ भेभोजज्युत्तराषाढा जुजेजोषा तथाभिजित्। खिखूखेखो श्रवो ज्ञेयो गगीगूने धनिष्ठिका ॥ 17 ॥ न नी नू ने अनुराधा; नो या यी यू ज्येष्ठा; ये यो भ भी मूल; भू धा फ ड पूर्वाषाढ़; भे भो ज जु उत्तराषाढ़; जू जे जो ष अभिजित्; खी खू खे खो श्रवण; गा गी गू गे धनिष्ठा नक्षत्र के अक्षर होते हैं। गोसासिस् शताख्यं च पूभा सेसोददी मता। ऊभा दूधाझझा ज्ञेया देदोचाची च रेवती ॥ 18 ॥ इसके अतिरिक्त गो सा सी सु शतभिषा नामक नक्षत्र के; से सो द दी पूर्वाभाद्रपद; दू धा झ झा उत्तराभाद्रपद और दे दो चा ची रेवती के अक्षर होते हैं। अष्टोत्तरशतं वर्णाः (नक्षत्र चरणोद्भवाः। सम्भवन्त्यवकहोडयचक्रानुक्रमतः किल) ॥ 19 ॥