अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें216 अपराजितपृच्छा इस प्रकार 108 वर्ण इन नक्षत्रों के चरण के कहे जाते हैं जिससे सारा अवकहोडा चक्र पूरा क्रमवार बनता है। अथ राशिचरणविचारमाह — अश्विनीभरणीधिष्ण्ये कृत्तिकाप्रथमांघ्रिकम्। मेषः स्यात् कृत्तिकापादत्रितयं रोहिणी तथा ॥ 20 ॥ वृषभो मृगपूर्वार्धं तदर्धं च तथार्द्रभम्। पादत्रयं पुनर्वस्वोः स राशिर्मिथुनाभिधः ॥ 21 ॥ तदन्त्योऽघ्रिस्तथा पुष्यो ह्याश्लेषा कर्कटाभिधः। मघापूर्वोत्तराद्योऽघ्रिः सिंहस्तच्चरणत्रयम् ॥ 22 ॥ (उक्त चक्र के बाद नक्षत्रानुसार राशिज्ञान कहा जा रहा है) अश्विनी, भरणी और कृत्तिका के एक पाद या चरण पर्यन्त मेष राशि गिनी जाती है। कृत्तिका के तीन चरण, रोहिणी और मृगशिरा के दो चरण वृष राशि; मृगशिरा के दो चरण, आर्द्रा और पुनर्वसु के तीन चरण मिथुन राशि; पुनर्वसु का अन्तिम चरण, पुष्य और आश्लेषा से कर्क राशि; मघा, पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी के एक चरण से सिंह राशि होती है। हस्तचित्राभपूर्वार्धं कन्या चित्रोत्तरं दलम्। स्वातिभं च विशाखायाश्चरणत्रितयं तुला ॥ 23 ॥ तदन्त्योघ्र्यनुराधाख्ये ज्येष्ठाभं वृश्चिकः स्मृतः। मूलं पूर्वोत्तराषाढाप्रागङ्घ्रिः कथितो धनुः ॥ 24 ॥ उत्तराफाल्गुनी के तीन पाद, हस्त तथा चित्रा के दो चरण कन्या; चित्रा के अन्तिम दो चरण, स्वाती, विशाखा के तीन चरणों से तुला; विशाखा का अन्तिम चरण, अनुराधा और ज्येष्ठा से वृश्चिक; मूल, पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ का एक चरण धनु राशि होती है। उत्तराङ्घ्रित्रयं कर्णे धनिष्ठाप्रथमार्धकम्। मकराख्यो धनिष्ठाद्विदलं च शततारका ॥ 25 ॥ पूर्वापादत्रयं कुम्भस्तदन्यश्चरणस्तथा। ऊभाभं रेवती चैव मीनराशिः प्रकीर्तितः ॥ 26 ॥ इसी प्रकार उत्तराषाढ़ के तीन चरण शेष, श्रवण और धनिष्ठा के दो चरण से मकर राशि; धनिष्ठा के अन्तिम दो चरण, शतभिषा और पूर्वाभाद्रपद के तीन चरण कुम्भ और पूर्वाभाद्रपद का अन्तिम चरण, उत्तराभाद्रपद और रेवती से मीन राशि होती है।