भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-४५ 217 राशिनामानि — मेषो वृषोऽथ मिथुनं कर्कटः सिंहकन्यके । तुलाथ वृश्चिको धन्वी मकरः कुम्भमीनकौ ॥ २७ ॥ द्वादशैव राशयः स्युर्मेषाद्याः सम्प्रकीर्तिताः ॥ इस प्रकार मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन— ये बारह राशियाँ मेषादि क्रम से कही गई हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योपराजितपृच्छायां अवकहोटाचक्रज्योतिषाधिकारो नाम चतुश्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४४ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में अवकहोटाचक्रज्योतिष अधिकार नामक चवालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥ अवकहोटाचक्रज्योतिषं ज्योतिषफलं पञ्चचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४५ ॥ विश्वकर्मोवाच — दस्रोयमोऽनलो धाता चन्द्रः शिवस्तथादितिः । वाक्पतिर्नागपितरौ भगार्यमदिवाकराः ॥ १ ॥ त्वष्टा च वायुरिन्द्राग्नी मित्र इन्द्रश्च नैर्ऋतिः । जलं च विश्वेदेवाश्च विधिर्विष्णुस्तथा वसुः ॥ २ ॥ वरुणाऽजैकपाच्चैव तथाहिर्बुध्न्यपूषणौ । इत्यश्विन्यादिनक्षत्रदेवनामानि सन्ति हि ॥ ३ ॥ (इस प्रकरण में अश्विन्यादि क्रम से नक्षत्रों के स्वामी के नाम कहे जा रहे हैं) 1. अश्विनी नक्षत्र का स्वामी दस्र या अश्विनीकुमार, 2. भरणी का यम, 3. कृत्तिका का अग्नि, 4. रोहिणी का धाता, 5. मृगशिरा का चन्द्र, 6. आर्द्रा का शिव, 7. पुनर्वसु का अदिति (देवमाता), 8. पुष्य का वाक्पति (बृहस्पति), 9. आश्लेषा का नाग, 10. मघा का पितर, 11. पूर्वाफाल्गुनी का भग, 12. उत्तराफाल्गुनी का अर्यमा, 13. हस्त का दिवाकर, 14. चित्रा का त्वष्टा, 15. स्वाति का वायु, 16. विशाखा का इन्द्राग्नि, 17. अनुराधा का मित्र, 18. ज्येष्ठा का इन्द्र, 19. मूल का नैर्ऋति (राक्षस), 20. पूर्वाषाढ़ा का जल, 21. उत्तराषाढ़ा का विश्वेदेव, 22. अभिजित् का विधि, 23. श्रवण का विष्णु, 24. धनिष्ठा का वसु, 25. शतभिषा का वरुण, 26. पूर्वाभाद्रपद का अजैकपाद, 27. उत्तराभाद्रपद का अहिर्बुध्न्य तथा 28. रेवती नक्षत्र का स्वामी पूषा है।¹

  1. दैवज्ञवल्लभ में श्रीपति भट्टाचार्य ने यही सूची दी है— भेशाः क्रमशोश्वनौयमाग्निः केन्दुशर्वोदिति