अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें218 अपराजितपृच्छा अथ योनिवैरमाह — योनिवैरं च कथये गणानां च समुद्भवम्। अश्वोगजश्छागसर्पौ सर्पश्वानबिडालकाः। मेषो बिडालकश्चैव मूषको मूषकश्च गौः॥ ४॥ महिषी च ततो व्याघ्रो महिषो व्याघ्रकः क्रमात्। मृगो मृगस्तथा श्वा च कपिर्नकुल एव च॥ ५॥ नकुलो वानरः सिंहस्तुरगो मृगराट् च गौः। इभ एताः क्रमेणैव ह्यश्विन्यादिभयोनयः॥ ६॥ अब मैं गणों से बनने वाले योनि वैर के विषय में कहता हूँ। अश्व, गज, छाग, सर्प मे; सर्प, श्वान, बिडाल में; मेष और बिडाल में; मूषक, मूषक में और गौ में; महिषी और व्याघ्र में; महिष और व्याघ्र में भी; मृग, मृग में और श्वान में; कपि और नकुल में; नकुल और वानर में; सिंह और तुरग में; मृगराज और गौ में, हाथी में— ये सब क्रम से अश्विनी आदि में भयोत्पादक कहे गए हैं। स्थिरचरद्विस्वभावमृदूग्रातुरतेजसः। अष्टाविंशतिकं₂₈ यावद् भचतुष्कनिबन्धनम्॥ ७॥ स्थिर, चर, द्विस्वभाव, मृदु, उग्र, आतुर, तेजस— सभी अट्ठाईस नक्षत्र इन चार कोटियों में परिबद्ध होते हैं। गोव्याघ्रं गजसिंहं च महिषाश्वं श्वहारिणम्। बभ्रुसर्पं कीशमेषं बिडालोन्दुरकं तथा॥ ८॥ चतुर्दश भद्विकानां योनिवैरं च समधा। जीवकाद्द्जेयाः। परनोथभगोर्यमाभिधानो मार्तण्डोमुखर्द्धकिः समीरः॥ पुरहूतहुताशनौ च मित्रं शक्रोनिरृतिरथो जलं च विश्वेक। हरिवसवोम्बुपाजपादोऽहिर्बुध्न्यः कथितस्त तस्य पूषाः॥ (दैवज्ञवल्लभ, बड़ौदा ओरियंटल इंस्टीट्यूट में विद्यमान मातृका, 5, 1-2) विष्णुधर्मोत्तरपुराण में कृतिका से नक्षत्र स्वामी की गणना की गई है। अश्विन्यादि के क्रम से गणना की देन वराहमिहिर की है। पुराणकार की मान्यता है— अतः परं प्रवक्ष्यामि तव नक्षत्रदैवताः। कृत्तिका चाग्निदैवत्या रोहिण्यर्केश्वरा स्मृता॥ इन्द्रर्क्षः सौम्यदैवत्यो रौद्री आर्द्रा तथा स्मृता। पुनर्वसुस्तथादित्यो पुष्यश्च गुरुदेवतः॥ आश्लेषा सर्पदैवत्या मघा च पितृदेवता। भाग्याश्च पूर्वफाल्गुन्य आर्यमाश्च तथोत्तराः॥ सावित्रश्च तथा हस्तश्चित्रा त्वाष्ट्री प्रकीर्तिता। स्वातिक्ष वायुदैवत्यो मूलञ्च तदुदाहृतम्। आप्यस्त्वाषाढ पूर्वाः स्युश्चोत्तरा वैश्वदैवताः॥ ब्राह्मी चैवाभिजित्प्रोक्ता श्रवणो वैष्णवः स्मृतः। वासवं च तथा ऋक्षं धनिष्ठा प्रोच्यते बुधैः॥ तथा शतभिषक्प्रोक्त नक्षत्रे वारुणं नृप। आजं भद्रापदापूर्वा आहिर्बुध्न्यं तथोत्तरा॥ पौष्णं च रेवती चार्थमश्विनी चाश्विदैवतम्। भरण्याश्च तथा याम्य प्रोक्तास्ते ऋक्षदैवताः॥ (विष्णुधर्मोत्तर. 1, 84, 13-21, तुलनीय — बृहत्संहिता 98, 4-5)