अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४५ 219 गौ-व्याघ्र में, गज-सिंह में, महिष-अश्व में, श्वान-हरिण में, नकुल-सर्प में, वानर-मेष में, बिडाल और उन्दर में - इन चौदहों में योनि वैर सात प्रकार का कहा गया है। अथाष्टकवर्गमाह - अष्टवर्ग तथा चैषां कथयाम्यपराजित ॥ ९॥ अकचटतपयशा ( इत्येते ) अष्टवर्णाः । आऽऽद्याः शान्ता अष्टवर्णा दैवज्ञवचनैः शुभाः। अब हे अपराजित ! मैं अष्टवर्ग के बारे में कहता हूँ। अकचट तपयश - ये अष्टवर्ण कहे जाते हैं। आ से आरम्भ होने वाले अष्टवर्णों को ज्योतिषियों के वचनों में शान्त और शुभ कहा गया है। दम्पती स्वामिभृत्यै च ग्रहग्रामाधिपे गणाः ॥ १०॥ साध्यवर्गे दशगुणे परवर्गेण मिश्रिते । वसुभिश्च हरेद्भागं यच्छेषं लभ्यमादिशेत् ॥ ११॥ इनसे पति-पत्नी, स्वामी-सेवक, ग्रह और ग्रामाधिपतियों का गणन करते हैं। साध्य वर्ग में दश से गुणित करते हैं, परवर्ग में मिश्रित करके, आठ से भाग दें और जो लब्ध हो, उसे ग्रहण करें। एवं वर्ग पुनः शोध्यमनेनानुक्रमेण च। शेषोद्धरितमध्यपात्य वृद्धयर्थे दैवदैत्यकः ? ॥ १२॥ तस्य लभ्यं च योऽग्रतः पृष्ठोऽसौ ददते ध्रुवम् । लाभालाभौ चैव येषां कथये त्वपराजित ॥ १३ ॥ इस प्रकार वर्ग को पुनः शोधन करके इसी प्रकार के अनुक्रम से शेष को उद्धरित करके मध्यमान करके बुद्धि के लिए दैव-दैत्य (?) उसके लब्ध को आगे रखें और पीछे को ध्रुव स्थिर देवें। इससे जो लाभ-हानि होती है, उसको हे अपराजित ! मैं कहता हूँ। अईऊए तार्क्ष्यः पूर्वे आग्नेय्यां च कखादिकाः । दक्षिणे च छावर्गाश्च नैर्ऋते च टठादिकाः ॥ १४॥ पश्चिमे तथादिवर्गा वायव्ये च पफादिकाः । उत्तरे च यरलवा ईशाने शषासास्तथा ॥ १५॥ इति वर्गाष्टकम् । अ ई ऊ ए नक्षत्रों को पूर्वदिशा में, क ख आदि को आग्नेय दिशा में, छ वर्ग