भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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220 अपराजितपृच्छा को दक्षिण दिशा में, टठादि को नैर्ऋत्य दिशा में, त थ आदि वर्ग को पश्चिम दिशा में, प फ आदि को वायव्य दिशा में, य र ल व को उत्तर दिशा में और श ष स आदि को ईशान कोण में (न्यसित करें)। अथोष्टोत्तरीदशामाह — रविचन्द्राङ्गारबुधशनिवाक्यपतिराहवः । तथा शुक्रः समाख्याताः प्राच्यादिषु प्रदक्षिणम् ॥ 16 ॥ षट्₆ तथा तिथयश्चैव₁₅ वसवश्च₈ समदश₁₇ । दश₁₀ चैकोनविंशति₁₉र्द्वादश₁₂ त्वेकविंशतिः₂₁ ॥ 17 ॥ सूर्यादेः क्रमयोगेन प्राच्यादिषु प्रदक्षिणम् । भुक्तिमार्गदशाश्चैव वर्षाणां सङ्ख्यया तथा ॥ 18 ॥ (अब अष्टोत्तरीदशा का वर्णन किया जा रहा है) सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, शनि, बृहस्पति, राहु तथा शुक्र— ये सब प्राची अर्थात् पूर्व दिशा से प्रदक्षिणतः रहते हैं। छह, पन्द्रह, आठ, सत्रह, दस, उन्नीस, बारह तथा इक्कीस सूर्य के आदि क्रम से पूर्व दिशा की ओर से प्रदक्षिणतः रहते हैं। इस प्रकार महादशाओं के भोग मार्ग के वर्ष की संख्या होती है।¹ यस्य नामाक्षरं प्रोक्तं विभक्ती ? चर्क्षभुक्तयां । तेषामनुक्रमेणैव कथयेऽन्तर्दशाफलम् ॥ 19 ॥

  1. यहाँ ग्रन्थकार ने अष्टोत्तरी महादशा का वर्णन किया है। ज्योतिषशास्त्र में कहा गया है कि गुर्जर-मरु, कच्छ, सौराष्ट्र, पाञ्चाल, सिन्धु पर्वतादि क्षेत्र में अष्टोत्तरी दशा से जातक का विचार किया जाना चाहिए— गूर्जरे कच्छसौराष्ट्रे पाञ्चाले सिन्धुपर्वते। एतेष्वष्टोत्तरी श्रेष्ठाऽन्यत्र विंशोत्तरीयता ॥ बृहत्पाराशर होराशास्त्र में महर्षि पराशर ने मैत्रेयी के प्रश्न पर विंशोत्तरी की श्रेष्ठता के साथ ही अष्टोत्तरी की दशा को भी स्वीकार्य किया है। 'मानसागरी' में कहा गया है कि शुक्ल पक्ष में जन्म हो तो अष्टोत्तरी तथा कृष्णपक्ष में जन्म हो तो विंशोत्तरी दशा से विचार करना चाहिए। साथ ही मानसागरीकार ने अष्टोत्तरी दशा का विवरण भी दिया है। (मानसागरी : मानसागरकृत व्या. विजयकान्त मिश्र शास्त्री, वाराणसी 1999, 5, 14-15 व 23) सूत्रधार मण्डन के अनुसार इस दशा में क्रमानुसार सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, शनि, गुरु, राहु व शुक्र— इन आठ ग्रहों को दशाधिप बताया है, इसमें केतु की दशा नहीं होती। (राजवल्लभ. 12, 35) इसकी विधि मानसागरी में आई है। पहले दशा को दशा से गुणा करें और 9 का भाग दें। इस प्रकार मास को निकालकर शेष को 30 से गुणाकर 9 का भाग दें, जिससे दिन निकलता है और पुनः शेष को 60 से गुणाकर यदि 9 का भाग दें तो घटी निकलती है। इस प्रकार दशा में अन्तर्दशा को जाना जा सकता है— नवभिर्वर्षैर्मासः शेषमर्कगुणं कुरु। मासान् क्षिपत्वा ततांस्त्रंशद्गुणं तत्र दिन क्षिपेत्॥ अष्टोत्तरशतेनाप्तं 108 दिनं तद्द्द्युवका बुधाः। तच्च षष्टिगुणं कृत्वा तन्मध्ये घटिकाः क्षिपेत्॥ अष्टोत्तरशतैर्भागं 108 लब्धाङ्के घटिकाः वदेत्। शेषं षष्टि 60 गुणं कृत्वा स्वहरैर्भागमाहरेत॥ लब्धाङ्के च एवं तेषां शेषां लब्धि ...