अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
DevanagariHindipublished535 पृष्ठ
पृष्ठ 268, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 268
सूत्र-४५ 221 एकैकदशयुक्तांश्च प्रवर्तन्ते चाष्टौ दशाः । भुक्तमानभुक्तायुक्ता ? दशाश्चैव दशोद्भवाः ? ॥ २० ॥ वरिष्यन्ते दि( द )शासाध्य दिनान्ते चारुवर्द्धनम ? । अष्टद( त्रिं )श कृत्वानं भक्ते ग्रहाष्टौ भुक्त व दशा ? ॥ २१ ॥ जातक का जो नामाक्षर हो, उसके नक्षत्रों की भुक्ति देखकर, उसी के अनुक्रम से अन्तर्दशा और उसका फल कहा जाना चाहिए।¹ एक-एक दशा में आठों ही अन्तर्दशाएँ चलती हैं और भुक्ता व भुक्तमान दशा दस प्रकार की होती है । दशासाध्या का वरण दिनान्त में ठीक वर्धन युक्त होता है(?)। अष्ट व त्रिंश का भाग देने से आठों भुक्त दशा निकल आती है। अथ सूर्यदशाफलमाह — सक्लेशाः कार्यहीनाश्च गृहसन्तापवर्द्धनम् । शत्रुक्षयस्तेजोवृद्धिभास्करस्य दशाफलम् ॥ २२ ॥ जातक के जब सूर्य की महादशा चलती हो तब क्लेश, कार्यहीनता, गृह सन्तापवर्द्धन लेकिन शत्रुओं का क्षय और तेजस्विता में वृद्धि होती है । चन्द्रदशाफलमाह — शत्रुश्च जायते मित्रममृतवाग् जनप्रियः । लभते चोत्सवं नित्यं शैत्यं चन्द्रदशाफलम् ॥ २३ ॥ जातक के जब चन्द्र की महादशा चलती है तब शत्रु भी मित्र बन जाते हैं, वाणी में अमृत तुल्य मधुरता आती है। लोकप्रियता बढ़ती है। उत्सवधर्मिता होती है एवं शान्ति रहती है । अथाङ्गारकदशाफलमाह — क्रूररोगा जनाः सर्वे ह्यग्निदाहोद्भवादिकम्। अर्थक्षयो दिने नित्यमङ्गारकदशाफलम् ॥ २४ ॥
- इसको निम्न सारणी से समझा जा सकता है— दशेश सू. चं. मं. बु. श. बृ. श शु. वर्ष 6 15 8 17 10 19 12 21 नक्षत्र आ. म. ह. अनु. पू.षा. ध. उ.मा. कृ. पुन. पू.फा. चि. ज्ये. उ.षा. श. रे. रो. पुष्य उ.फा. स्वा. मू. अभि. पू.भा. भ. मृ. श्ले विशा. श्रवण