भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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222 अपराजितपृच्छा मङ्गल की महादशा में लोग क्रूर रोगों से ग्रस्त होते हैं। अग्निदाह की सम्भावना रहती है। धन का क्षय होता है। बुधदशाफलमाह — बुद्धिवृद्ध्यर्थवृद्धी च सस्नेहं शोकशान्तिकम्। धनपुत्रभार्यामित्रं बुधग्रहदशाफलम् ॥ 25 ॥ बुध की महादशा में बुद्धि बढ़ती है। स्नेह बढ़ता है और शोक का निवारण होकर शान्ति की प्राप्ति होती है। धन, पुत्र, भार्या, मित्र सभी अनुकूल होते हैं। अथ शनिदशाफलमाह — देशत्यागो भय पीडा मित्रैः सह विरोधनम्। पुत्रबन्धुस्त्रीवियोगः शनैश्चरदशाफलम् ॥ 26 ॥ शनि की महादशा में अपना देश त्यागना पड़ता है। भय बढ़ता है। पीड़ा होती है, मित्रों से विरोध हो जाता है और पुत्र, बन्धु व स्त्री से वियोग हो जाता है। गुरुदशाफलमाह — आरोग्यं राज्यसन्मानमर्थवृद्धिः सदाजयः। पूज्यन्ते गुरुतुल्याश्चाशोका गुरुदशाफलम् ॥ 27 ॥ जब गुरु की महादशा आरम्भ होती है तो आरोग्य में वृद्धि होती है। राज्य से सम्मान मिलता है। धन की वृद्धि होती है और सदा विजय मिलती है। लोग जातक की गुरु तुल्य भाव से पूजा आरम्भ करते हैं। कोई शोक नहीं रहता। राह्वादशाफलमाह — सदा पीडा गृहबन्धुस्थानत्यागोऽथ जायते। राजगृहदण्डदुःखं प्रोक्तं राहुदशाफलम् ॥ 28 ॥ राहु की महादशा नित्य कष्ट पीड़ा बनाए रखती है। गृहत्याग, बन्धु त्याग और स्थान त्याग सम्भव है। राजदण्ड की आशंका भी रहती है और दुःख-पीड़ा की वृद्धि होती है। शुक्रदशाफलमाह — तेजः सदा च सन्मानं पुत्रलाभो धनागमः। सुखमाप्नोति शारीरं शुभं शुक्रदशाफलम् ॥ 29 ॥ इति दशाफलम्।