अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें224 अपराजितपृच्छा हसितायां च हास्यं स्यात् कम्पितायां च कम्पनम्। ज्वरितायां ज्वरपीडा स्वस्थायां स्वस्तिकोद्भवः ॥ ३३ ॥ भुक्तायां भोजनप्राप्तिः सुप्तायां चैव निद्रितम्। जागर्तिर्जागृत्तायां च भोग्यायां बहुभोग्यता ॥ ३४ ॥ इनके नामानुसार ही चन्द्रमा की प्रवासावस्था में प्रवास होता है, नष्टावस्था में हानि, मृतावस्था में मृत्यु की आशंका रहती है। जयावस्था में विजय होती है और हसितावस्था में प्रसन्नता होती है। कम्पितावस्था में भय से कम्पन होता है और ज्वरितावस्था में ज्वर पीड़ा होती है। स्वस्थावस्था में स्वस्त्यायन का उदय होता है। भुक्तावस्था में भोजन की प्राप्त और सुप्तावस्था में निद्रा होती है। जाग्रतावस्था में जाग्रति बनी रहती है। भोग्यावस्था में जातक को बहुत प्रकार के भोगों का सुख सुलभ होता है। पञ्चत्रिंशोत्तरशतं घटिका राशिकोद्भवाः । राशिद्वादशके चैव शुभ्रश्चन्द्रो यथाबलम् ॥ ३५ ॥ राशियों से 135 घटिकाएँ उत्पन्न होती हैं। इन बारह राशियों में शुभ चन्द्र हो तो वह बलवान होता है।¹ जन्मानुसारेणचन्द्रदशासफलमाह — जन्मस्थः कुरुते पुष्टिं जन्मनक्षत्रवर्जितम्। तथानुक्रमतश्चैव द्वितीये नैव निर्वृतिः ॥ ३६ ॥ जन्मस्थ बलवान चन्द्रमा पुष्टि करता है चाहे जन्म नक्षत्र कोई भी हो, उससे कोई तात्पर्य नहीं है। इसी अनुक्रम में दूसरे गृह में शुभ चन्द्रमा बलवान हो तो काम-धन्धे में कोई कमी नहीं होती, धनागम बना रहता है। तृतीये राजसन्माजं चतुर्थे कलहागम्। पञ्चमेऽर्थपरिश्रंशः षष्ठे चैव धनागमः ॥ ३७ ॥ यदि तृतीय स्थान में चन्द्रमा हो तो राज्य की ओर से सम्मान मिलता है किन्तु
- मुहूर्तकल्पद्रुम में कहा गया है कि मेष आदि द्वादश राशियों में क्रम से अपने नामानुसार फल देने वाली चन्द्रमा की अवस्थाएँ हैं— 1. प्रवासावस्था (11.15 घटी-पल) 2. नष्टावस्था (22.30 घटी-पल) 3. मृतावस्था (33.45 घटी-पल) 4. जयावस्था (45.00 घटी) 5. हास्यावस्था (56.15 घटी-पल) 6. प्रीति या कामोपभोग (67.30 घटी-पल) 7. क्रीड़ावस्था (78.45 घटी-पल) 8. सुप्तावस्था (90.00 घटी) 9. भुक्तावस्था (101.15 घटी-पल) 10. ज्वरावस्था (112.30 घटी-पल) 11. प्रकम्पावस्था (123.45 घटी-पल) और 12 स्थिरावस्था (135.00 घटी)— प्रवासनष्टे च मृता जया च हास्या च मुत्क्रीडनसुप्तभुक्ताः ॥ ज्वरप्रकम्पस्थिरनामधेया नाम्ना समं तासु फलं शुभेषु। (मुहूर्तकल्पद्रुम 10, 25)