भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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ताराबलमाह - Wait, is it "अथ चन्द्र-ताराबलमाह —" or "अथ चन्द्र-ताराबलमाह —"? It is "अथ चन्द्र-ताराबलमाह —"

Line 13: शुक्लपक्षे चन्द्रबलं कृष्णे ताराबलं शुभम्।

Line 14: द्विपञ्चनवमे चन्द्रः शुक्लपक्षे तु कामदः ॥ ४० ॥

Line 15: शुक्लपक्ष में चन्द्रमा का बल बढ़ा हुआ होता है जो शुभ है परन्तु कृष्णपक्ष में

Line 16: तारा बल प्रशस्त माना जाता है। दूसरे, पाँचवें और नवें भाव में चन्द्रमा शुक्ल पक्ष Wait, "तारा बल" or "ताराबल"? Space between तारा and बल. "शुक्ल पक्ष" or "शुक्लपक्ष"? Space between शुक्ल and पक्ष.

Line 17: में बड़ा ही लाभप्रद और कामनापूर्ति करने वाला होता है।²

Now, let's map each visual line carefully and assign , , etc.

Visual lines from top to bottom: Header: सूत्र-४५ 225 Text: चतुर्थ स्थान में चन्द्रमा कलहकारी होता है। पाँचवें गृह में चन्द्रमा धननाश करता है और छठवें स्थान में चन्द्रमा हो तो धनागम होता है। सप्तमे राजपूजा च ह्यष्टमे प्राणनाशनम्

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