अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें226 अपराजितपृच्छा तिथिस्त्वेकगुणा प्रोक्ता नक्षत्रञ्च चतुर्गुणम् । करणः षोडशगुणो वारश्चाष्टगुणो मतः ॥ 41 ॥ इनमें भी तिथि का बल मात्र एक गुण ही होता है जबकि नक्षत्र सदा ही उससे चौगुना फलदायी होता है । इससे सोलह गुणा फल करण बल का कहा है और वार बल इससे आठ गुना फल देता है।¹ द्वात्रिंशद्गुणको योगस्ताराश्चतुःषष्टिगुणाः । चन्द्रः शतगुणः प्रोक्तस्तस्माच्चन्द्रबलं बलम् ॥ 42 ॥² इसी प्रकार बत्तीस गुणा फल योग से और ताराओं से चौंसठ गुणा फल का लाभ होता है परन्तु ध्यान रहे कि चन्द्रमा का फल सदा ही सौ गुणा माना गया है । इसीलिए चन्द्रबल को ही सही तौर पर बल कहा गया है । न सूर्यवेधो दशचक्रसङ्कुलम् गण्डेऽतिशूले परिधे च वैधृते । न राहुपृथ्वीग्रहयोग... ...( यद्येव ) हनते चन्द्र सहस्रदोषम् ॥ 43 ॥ सूर्यवेध, दशचक्र समूह का गण्ड, अतिशूल, परिघ, वैधृति, राहु-पृथ्वी योग ग्रहणादि कोई भी दोष नहीं होते क्योंकि केवल एक चन्द्रमा के बलवान शुभ होने पर हजारों दोषों को अकेला ही हर लेता है । इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योपराजितपृच्छायां ज्योतिषलक्षणाधिकारो नाम पञ्चचत्वारिंश सूत्रम् ॥ 45 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ज्योतिष लक्षण अधिकार नामक पैंतालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 45 ॥
- राजमार्तण्ड में यह श्लोक इस प्रकार आया है— तिथिरेकगुणा प्रोक्ता नक्षत्रञ्च चतुर्गुणम्। वाराश्चाष्टगुणश्चैव चन्द्रः शतगुणः स्मृतः॥ (ज्योतिर्निबन्ध पृष्ठ 62, श्लोक 25) राजमार्तण्ड के मूल पाठ में 41-42वें श्लोक इन श्लोकों का पाठान्तर इस प्रकार आया है— तिथिरेकगुणा प्रोक्ता वारश्चैव चतुर्गुणः। ऋक्षं षोडशमित्याहुर्योगश्चैव शताधिकः॥ सहस्रांशा रविः प्रोक्तश्चन्द्रो लक्षगुणाधिकः। वर्जयित्वा बलं सर्वं तस्माच्चन्द्रबलाबलम्॥ (राजमार्तण्ड 596-597)
- उक्त दोनों श्लोक नारद के हैं, अत्यल्प पाठान्तर के साथ ये तुलनीय हैं— तिथिस्त्वेकगुणा प्रोक्ता नक्षत्रं च चतुर्गुणम्। वारश्चाष्टगुणः प्रोक्तः करणं षोडशान्वितम्॥ द्वात्रिंशल्लक्षणो योगस्तारा षष्ठिगुणा स्मृता। चन्द्रे शतगुणं पुंसां तस्माच्चन्द्रबलं बलाधिकम्॥ (बृहद्दैवज्ञरञ्जनम् 27, 10-11 पर उद्धृत)