अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४६ 227 ज्योतिषलक्षणात्मकं षट्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४६ ॥ विश्वकर्मावाच । नक्षत्रसञ्ज्ञा च प्रत्येकनक्षत्रकृत्यानि । तत्रैव पार्श्वतोमुखीनक्षत्रं — रेवती चाश्विनी चित्रा हस्तः स्वातिपुनर्वसू । अनुराधा मृगो ज्येष्ठा नवैताः पार्श्वतोमुखाः ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले— रेवती, अश्विनी, चित्रा, हस्त, स्वाती, पुनर्वसु, अनुराधा मृगशिरा और ज्येष्ठा— ये नौ नक्षत्र पार्श्वतोमुखी कहे जाते हैं। गजोष्ट्राश्वाजमहिषवृषादेर्दमनं शुभम् । कुर्याद्वेश्मप्रवेशादि गमनागमने तथा ॥ २ ॥ इन नक्षत्रों में हाथी, ऊँट, घोड़े, अज, महिष, वृष आदि का दमन (बधियाकरण) शुभ है। घर में आते-जाते समय भी इनका मिलना शुभ हैं। अरहट्टचक्रयन्त्रं रथप्रभृतियापनम् । प्रमाणं प्रेरणं चैव कार्यं वै पार्श्वतोमुखैः ॥ ३ ॥ इसी प्रकार रहट या जलोत्थान यन्त्र का सञ्चालन, रथादि वाहनों को चलाना, इनको प्रमाणित करना, प्रेरित करना आदि सभी कार्य इन पार्श्वतोमुखी नक्षत्रों में करना हो तो ठीक रहता है। अधोमुखीनक्षत्रं — कृत्तिका भरणी चैव मघा मूलविशाखिके । तिस्रः पूर्वास्तथाश्लेषा ह्यधोवक्त्राः प्रकीर्तिताः ॥ ४ ॥ कृत्तिका, भरणी, मघा, मूल, विशाखा, चित्रा, पूर्वा, आश्लेषा— ये सब अधोमुखी नक्षत्र माने जाते हैं। वापी कूपतडागानि तथा भूमिगृहाणि च । विद्यारम्भं निधानं च पातालादिप्रवेशनम् ॥ ५ ॥ इनमें वापी, कूप, तड़ाग, भूमिग्रहण, विद्यारम्भ, निधान (पूँजी गाड़ना), पाताल-गुहादि में प्रवेश कार्य किए जाते हैं। ऊर्ध्वमुखीनक्षत्रं — पुष्यार्द्रे रोहिणी चैव धनिष्ठा चोत्तरात्रयम् । श्रवणं शतताराश्च नवैवोर्ध्वमुखाः स्मृताः ॥ ६ ॥ पुष्य, आर्द्रा, रोहिणी, धनिष्ठा, उत्तरात्रय (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ व उत्तराभाद्रपद), श्रवण, शतभिषा— ये नौ ऊर्ध्वमुखी नक्षत्र कहे जाते हैं।