भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 275

228 अपराजितपृच्छा आसु राजाभिषेकं च पट्टबन्धं महोत्सवम्। प्रासादं च गृहं चैव पताका छत्रचामरम्॥ ७॥ आरामनगरारम्भं निधीनां तु निषेचणम्। ऊर्ध्ववक्त्रेषु कर्माणि तानि सर्वाणि कारयेत्॥ ८॥ इन नक्षत्रों में जो कार्य होते हैं उनमें राज्याभिषेक, पट्टबन्ध, महोत्सव, प्रासाद, गृह, पताका, छत्र, चामर, बगीचे, नगर-निवेशारम्भ, राशि निवेशन मुख्य हैं अर्थात् ऊर्ध्वमुखी नक्षत्रों में उक्त कार्य करने चाहिए।¹ राक्षसगुणप्रधानाः - मघाश्लेषा विशाखा च कृत्तिका शततारका। चित्रायुक्ता धनिष्ठा च ज्येष्ठा मूलं च राक्षसः॥ ९॥ मघा, आश्लेषा, विशाखा, कृतिका, शतभिषा, चित्रा, धनिष्ठा, ज्येष्ठा और मूल— ये नक्षत्र राक्षस गुण प्रधान होते हैं। मनुष्यगुणप्रधानाः - पूर्वास्तिस्रो रोहिणी च ह्यार्द्रा च भरणी तथा। तिस्रश्चैवोत्तरावैवं मनुष्यः सम्प्रकीर्तितः॥ १०॥ तीनों पूर्वा, रोहिणी, आर्द्रा, भरणी और तीनों उत्तरा— ये नौ नक्षत्र मनुष्य गुण (गण क्रम से) प्रधान माने जाते हैं। देवगुणप्रधानाः - मृगाश्विनी रेवती च हस्तः स्वातिपुनर्वसू। पुष्यानुराधाश्रवणमिति देवगणः स्मृतः॥ ११॥

  1. राजवल्लभ. में भी यह वर्णन आया है। इसे इस तालिका से स्पष्ट किया जा सकता है— क्रम संज्ञा नक्षत्रों के नाम करणीय कार्य
  2. अधोमुख     पूर्वात्रय, आश्लेषा, मघा,  भूमिखात, विधिरोपण, उग्रकार्य
    

कृतिका, मूल, भरणी, विशाखा 2. पार्श्वमुख चित्रा, अश्विनी, अनुराधा, वाहन, यन्त्र, हलारोहण, पशुकृत्य पुनर्वसु, स्वाती, ज्येष्ठा, मृगशिरा, रेवती, हस्त 3. ऊर्ध्वमुख पुष्य, उत्तरात्रय, आर्द्रा, गृहप्राकार, देवगृह, उच्चहर्म्य, श्रवण, धनिष्ठा, रोहिणी, छत्र-चामर, राज्याभिषेक शतभिषा