अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४६ 229 मृगशिरा, अश्विनी, रेवती, हस्त, स्वाती, पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा और श्रवण— ये नौ देवगण प्रधान नक्षत्र माने जाते हैं। स्वगणे चोत्तमा प्रीतिर्मध्यमा देवमानुषे । देवासुरे च कलहो मरणं नरराक्षसे ॥ 12 ॥ उक्त नक्षत्रों में अपने गण वाले नक्षत्रों में उत्तम प्रीति होती है। देवगण और मनुष्यगण नक्षत्रों में मध्यम प्रीति होती है। देवगण और राक्षसगण नक्षत्रों में कलह होता है और राक्षसगण तथा मनुष्यगण में मरण की आशंका रहती है। सूर्यपातस्ययोगमाह — आदित्ये द्वादशे ऋक्षे वर्जयेद् रविपातशः। मृत्युरष्टादशाश्चैव कम्पो वै एकोनविंशतिः ? ॥ 13 ॥ सूर्य अपने से बारहवें नक्षत्र पर रवि पातशः योग बनाता है। अतः ऐसे योग में काम नहीं करना चाहिए। इसी तरह सूर्य अठारहवें नक्षत्र पर मृत्युयोग और उन्नीसवें नक्षत्र पर कम्पयोग बनाता है। अतः ये योग भी वर्जित है, शुभ नक्षत्रों को ही ग्राह्य समझें (?)। एकविंशतिमे ऋक्षे निर्घातं पतते सदा। योगानेतान् रविपातान् वर्जयेच्छुभकर्मसु ॥ 14 ॥ इक्कीसवें नक्षत्र पर सूर्य आने पर सदा निर्घातपात् योग होता है। अतः इन सभी रविपात योगों को शुभ कर्म अवसर पर वर्जनीय कहा गया है। ग्रहाणां जन्मनक्षत्रं वर्जयेच्छुभकर्मसु । एते कलङ्क योगाः स्युर्गृहजन्मसु दूषिताः ॥ 15 ॥ जन्म नक्षत्र के ग्रहों को भी शुभ कर्म में वर्जनीय कहा है। ये सभी कलङ्क योग कहे गए हैं, जो गृहजन्म से दूषित है। त्रीणि च त्रीणि चाक्षाणि रविभौमशनिश्चराः । आलिङ्गितं धन्विनं चैव ? तृतीयमवलोकितम् ? ॥ 16 ॥ सूर्य, मङ्गल और शनिश्चर— ये तीनों जब तीन नक्षत्रों से आलिङ्गित या साथ, धन्विन तथा तृतीय अवलोकित-दृष्टि सम्बन्ध बनाते हों तो ये भी कलङ्क योग हैं, जो शुभ कर्म में वर्जित माने जाते हैं (?)। अथ क्षेत्राधिपत्याह — मेषवृश्चिकयोर्भौमः शुक्नो वृषतुलाधिपः। बुधः कन्यामिथुनयोः सोमो वै कर्कटाधिपः ॥ 17 ॥