भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 277

230 अपराजितपृच्छा सूर्यक्षेत्रं भवेत्सिंहो धनुर्मीनाधिपो गुरुः। शनिर्मकरकुम्भेश एते क्षेत्राधिपा ग्रहाः ॥ 18 ॥¹ ग्रह स्वामी रूप में मङ्गल मेष और वृश्चिक का; शुक्र वृष और तुला का; बुध कन्या और मिथुन का; चन्द्रमा कर्क का; सूर्य सिंह राशि का; गुरु धनु और मीन राशि का; शनि मकर और कुम्भ राशि का स्वामी अर्थात् क्षेत्राधिपति ग्रह होते हैं। न पीडयन्ति स्वक्षेत्रे स्वमित्रे च ग्रहास्तथा। विषमस्थाः पीडयन्ते भस्मीकुर्वन्ति विग्रहे ॥ 19 ॥ जब कोई ग्रह स्वक्षेत्र में हो और स्वमित्र के क्षेत्र में हो तो कभी भी पीड़ा नहीं पहुँचाते, परन्तु विषम ग्रह के क्षेत्र में हो तो बड़े विग्रहकारक बन जाते हैं और इतनी पीड़ा पहुचाते हैं कि वे भस्मसात कर देते हैं। ग्रहमैत्री — सोमश्च सूर्यभौमौ च त्रिदशाचार्य एव च। स्नेहानुगाश्च चत्वारो मैत्री स्यात्तु परस्परम् ॥ 20 ॥ सोम, सूर्य, मङ्गल और गुरु— ये चारों परस्पर मित्र भाव में स्नेहपूर्वक रहते हैं। भार्गवः सूर्यपुत्रश्च बुधश्चापि तृतीयकः । स्नेहानुगास्त्रयः प्रोक्ता मैत्री स्यात्तु परस्परम् ॥ 21 ॥ शुक्र, शनि और बुध— ये तीनों भी परस्पर स्नेह रहने से मित्रभाव वाले कहे गए हैं। ग्रहा एकत्र चत्वारिस्त्रिभिरेकत्र संस्थिताः । तेषां मध्ये रौद्रं घोरं महद्वैरस्य कारणम् ॥ 22 ॥ रविक्षेत्रे गते जीवे जीवक्षेत्रे गते रवौ। विवाहं व्रतबन्धं च कुर्याद्देशान्तरं तथा ॥ 23 ॥ यदि तीन या चार ग्रहों की युति एक क्षेत्र में हो तो यह स्थिति उनमें महान् रौद्र रूप में घोर वैर का कारण बनती है, रवि के क्षेत्र में गुरु हो या गुरु के क्षेत्र में रवि हो तो ऐसे समय में विवाह, व्रतबन्ध और देशान्तर गमन वर्जित है। (द्विर्द्वादशे त्रिकोणे च न कदाचित्षडष्टके )² उद्वेगं कलहो हानिः सुखं नैव कदाचन ॥ 24 ॥

  1. ये श्लोक नारद से तुलनीय है— मेषवृश्चिकयोर्भीमः कन्यामिथुनयोर्बुधः। धनुर्मीन द्वयोर्मन्त्री शुक्नो वृषतुलेश्वरः ॥ शनिर्मकरकुम्भेश इत्येते राशिनायकाः । (नारदसंहिता 29, 32-33)
  2. प्रकाशित पाठे नोपलभ्यते।