अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
230 अपराजितपृच्छा सूर्यक्षेत्रं भवेत्सिंहो धनुर्मीनाधिपो गुरुः। शनिर्मकरकुम्भेश एते क्षेत्राधिपा ग्रहाः ॥ 18 ॥¹ ग्रह स्वामी रूप में मङ्गल मेष और वृश्चिक का; शुक्र वृष और तुला का; बुध कन्या और मिथुन का; चन्द्रमा कर्क का; सूर्य सिंह राशि का; गुरु धनु और मीन राशि का; शनि मकर और कुम्भ राशि का स्वामी अर्थात् क्षेत्राधिपति ग्रह होते हैं। न पीडयन्ति स्वक्षेत्रे स्वमित्रे च ग्रहास्तथा। विषमस्थाः पीडयन्ते भस्मीकुर्वन्ति विग्रहे ॥ 19 ॥ जब कोई ग्रह स्वक्षेत्र में हो और स्वमित्र के क्षेत्र में हो तो कभी भी पीड़ा नहीं पहुँचाते, परन्तु विषम ग्रह के क्षेत्र में हो तो बड़े विग्रहकारक बन जाते हैं और इतनी पीड़ा पहुचाते हैं कि वे भस्मसात कर देते हैं। ग्रहमैत्री — सोमश्च सूर्यभौमौ च त्रिदशाचार्य एव च। स्नेहानुगाश्च चत्वारो मैत्री स्यात्तु परस्परम् ॥ 20 ॥ सोम, सूर्य, मङ्गल और गुरु— ये चारों परस्पर मित्र भाव में स्नेहपूर्वक रहते हैं। भार्गवः सूर्यपुत्रश्च बुधश्चापि तृतीयकः । स्नेहानुगास्त्रयः प्रोक्ता मैत्री स्यात्तु परस्परम् ॥ 21 ॥ शुक्र, शनि और बुध— ये तीनों भी परस्पर स्नेह रहने से मित्रभाव वाले कहे गए हैं। ग्रहा एकत्र चत्वारिस्त्रिभिरेकत्र संस्थिताः । तेषां मध्ये रौद्रं घोरं महद्वैरस्य कारणम् ॥ 22 ॥ रविक्षेत्रे गते जीवे जीवक्षेत्रे गते रवौ। विवाहं व्रतबन्धं च कुर्याद्देशान्तरं तथा ॥ 23 ॥ यदि तीन या चार ग्रहों की युति एक क्षेत्र में हो तो यह स्थिति उनमें महान् रौद्र रूप में घोर वैर का कारण बनती है, रवि के क्षेत्र में गुरु हो या गुरु के क्षेत्र में रवि हो तो ऐसे समय में विवाह, व्रतबन्ध और देशान्तर गमन वर्जित है। (द्विर्द्वादशे त्रिकोणे च न कदाचित्षडष्टके )² उद्वेगं कलहो हानिः सुखं नैव कदाचन ॥ 24 ॥
- ये श्लोक नारद से तुलनीय है— मेषवृश्चिकयोर्भीमः कन्यामिथुनयोर्बुधः। धनुर्मीन द्वयोर्मन्त्री शुक्नो वृषतुलेश्वरः ॥ शनिर्मकरकुम्भेश इत्येते राशिनायकाः । (नारदसंहिता 29, 32-33)
- प्रकाशित पाठे नोपलभ्यते।
सूत्र-४६ 231 द्विर्द्वादश, त्रिकोण और षडष्टक हो तो सम्बन्ध नहीं करें क्योंकि, ऐसे अवसर पर उद्वेग, कलह और हानि होती है और सुख तो कभी भी सुलभ नहीं होता। लग्नघटिकाप्रमाणं - वक्ष्ये द्वादश लग्नानि घटिकानां प्रमाणतः। सप्तपञ्चाशत्पलानि त्रिघट्यो मीनमेषयोः॥ २५॥ (विश्वकर्मा बोले कि) अब मैं बारह लग्नों को उनकी घटिकाओं तक सप्रमाण कहता हूँ। मीन, मेष की घटिकाएँ 3 घड़ी और 57 पल की होती हैं। वृषे कुम्भे चतस्त्रश्च षड्विंशति पलानि च। मिथुन मकरे पञ्च घट्यो नव पलानि च॥ २६॥ वृष व कुम्भ की 4 घड़ी और 26 पल होती हैं। मिथुन और मकर की 5 घड़ी और 9 पल होती हैं। धनुः कर्कटयोः पञ्च सप्तत्रिंशत् पलैः सह। सिंहवृश्चिकयोः पञ्च द्वात्रिंशच्च पलानि च॥ २७॥ धनु और कर्क की 5 घड़ी और 37 पल की होती है। सिंह और वृश्चिक की 5 घड़ी और 32 पल की होती है। पञ्चैव कन्यातुलयोरेकोनविंशतिपलैः। इत्थं लग्नप्रमाणानि प्रोक्तानि द्वादशैव च॥ २८॥ कन्या तुला की भी घटिकाएँ 5 घड़ी और 19 पल की होती हैं। इतने ये लग्न प्रमाण बारहों लग्नों के कहे गए हैं। दिवानिशालग्नानि - कर्कटानि निशालग्नं नक्रादि दिनलग्नकम्। लग्नानि षट् तथा रात्रौ दिने स्युः षट् तथैव च॥ २९॥ कर्कादि से रात्रि के लग्न और मकरादि से दिन के लग्न- इस तरह छह लग्न रात्रि के और छह लग्न दिन के होते हैं। अथ विप्रादीनाभिधानं - वृश्चिकः कर्कटो मीनो ब्राह्मणाः परिकीर्तिताः। धनुर्मेषस्तथा सिंहो राजानश्च शुभाः स्मृताः॥ ३०॥ कन्या वृषश्च मकरश्चैते वैश्या उदाहृताः। मिथुन च तुला कुम्भः शूद्रा एते प्रकीर्तिताः॥ ३१॥
232 अपराजितपृच्छा
वृश्चिक, कर्क और मीन राशि की ब्राह्मण संज्ञा कही है। धनु, मेष और सिंह राशि की क्षत्रिय संज्ञा; कन्या, मकर और वृष राशि की वैश्य संज्ञा और मिथुन, तुला एवं कुम्भ राशि की शूद्र संज्ञा कही गई है।¹ विप्रः कार्यों द्वादशभिः क्षत्रियो नवभिस्तथा। षड्लग्नैश्च भवेद् वैश्यस्त्रिभिः शूद्रः प्रशस्यते॥ 32॥ सामान्यतया बारह लग्नों से विप्र (ब्राह्मण) कार्य होते हैं। नौ लग्नों से क्षत्रिय कार्य; छह लग्नों से वैश्य कार्य और तीन लग्नों से शूद्र कार्य प्रशस्त कहे गए हैं। सिंहाली च घटवृषौ लग्नवेलासु चोत्तमाः। प्रासादप्रतिमालिङ्गजगतीपीठमण्डपात् ॥ 33 ॥ प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, जगती, पीठ और मण्डप के लिए सिंह, वृश्चिक, कुम्भ और वृष राशि के लग्न उत्तम माने गए हैं। नगरारामनिवेशं प्रतिष्ठाऽम्बुनिधेस्तथा। **गढदुर्ग
सूत्र-४७ 233 समपञ्चशलाकाश्च मद्रभिश्चककोत्तमम् ?। स्वरे स्वामिकान्तारेषु ग्रहवेधविशोधनम् ॥ ३७॥ इसी प्रकार वेध दर्शन के लिए ग्रहों की स्थिति पञ्चशलाका और सप्तशलाका चक्रों से उत्तम प्रकार से देखी जा सकती है। स्वर (वर = चुनाव) में स्वामी और कान्तार (अपने एवं पराए एवं पति-पत्नी) क्षेत्र में ग्रह वेध विशोधन करना चाहिए। रविवेधे च वैधव्यं चन्द्रे भृत्यं न जीवति। कुजे प्रजाक्षयं विद्याद् वन्ध्या सोमसुते मता ॥ ३८ ॥ रवि वेध से वैधव्य, चन्द्र वेध से सेवक की मृत्यु, मङ्गल वेध से प्रजा को क्षति जानना और सोमसुत अर्थात बुध के वेध से वन्ध्यत्व सूचित होता है। प्रव्रज्या गुरुवेधे तु अपुत्रा शुक्रवेधतः । दुःखदा सूर्यपुत्रेण ग्रहवेधविशोधनम् ॥ ३९ ॥ गुरु का वेध होने से प्रव्रज्या करनी पड़ती है। शुक्र वेध से सन्तानहीनता होती है तथा शनि के वैध से निश्चय ही दुःख आता है। इस प्रकार से यहाँ यह ग्रहों का वेध विशोधन कहा गया। इति सूत्रसन्ताणगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां ज्योतिषलक्षणाधिकारो नाम षट्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४६ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ज्योतिष लक्षण अधिकार नामक छियालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥ गणितक्षेत्रनिर्णयो नाम सप्तचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४७ ॥ विश्वकर्मोवाच — उद्धृत्य गणितात्सारं सर्वशास्त्रादिदीपकम्। वेदाश्रः क्षेत्रवास्तुश्च वृत्तश्चाष्टाश्र एव च ॥ १ ॥ ज्ञेयो द्वात्रिंशदश्रश्च शिलायां विविधोत्तमः । षट्कोधश्च त्रिकोणश्च चन्द्रार्धो गोलकः परम् ॥ २॥ विश्वकर्मा बोले कि सभी शास्त्रों के दीपक-तुल्य माने जाने वाले गणितशास्त्र का सार उद्धृत करके चतुरश्रक्षेत्र वास्तु, वृत्तक्षेत्र वास्तु, अष्टाश्रक्षेत्र वास्तु, बतीसकोणीयक्षेत्र वास्तु को विविध प्रकार की उत्तम शिलाओं से षट्कोण, त्रिकोण, अर्धचन्द्राकार तथा गोलाकार तक कहूँगा।
234 अपराजितपृच्छा अथ गणितपादं — आदौ गणितपादं च कथयिष्याम्यनुक्रमात् । तदन्तराणि क्षेत्राणि कथये विविधानि च ॥ ३॥ इसमें सबसे पहले 'गणित पाद' भाग को अनुक्रम से कहता हूँ, उसके बाद विविध प्रकार के क्षेत्रों के विषय में कहूँगा। एकात्पर्द्धादीनां गणनामाह — एकं दश शतमस्मात् सहस्रमनु चायुतम् । नियुतं प्रयुतं तस्मादर्बुदन्यर्बुदे अपि ॥ ४ ॥ वृन्दं खर्वनिखर्वाणि शङ्कुपद्माम्बुराशयः । ततः स्यान्मध्यमन्त्यं च परं चापरमप्यतः ॥ ५ ॥ परार्धं चेति विज्ञेयं दशवृद्धयोत्तरोत्तरम् ।¹ संख्या-स्थानानुसार मान इस प्रकार बताया है कि एक (1), दस (10), शत (100), सहस्र (1000), अयुत (10000), नियुत (100000), प्रयुत (1000000), अर्बुद (10000000), अन्यर्बुद (100000000), वृन्द (1000000000), खर्ब (10000000000), निखर्ब (100000000000), शङ्कु (1000000000000), पद्म (10000000000000) और इसके बाद अम्बुराशि (100000000000000) मध्य (1000000000000000), इसके उपरान्त अन्त्य (10000000000000000), पुनः पर (100000000000000000), अपर (1000000000000000000) तथा इसी प्रकार परार्ध (10000000000000000000) संज्ञक इन संख्याओं को उत्तरोत्तर दस- दस की वृद्धि से जानना चाहिए। अधोयोगे सङ्कलितास्तत् सङ्कलितमुच्यते ॥ ६ ॥ एक के नीचे एक संख्या रखते हुए उन्हें योग से सङ्कलित करने को सङ्कलित अर्थात् जोड़ कहते हैं।
- इस प्रकार से एक, दश, सौ, हजार, दस हजार, नियुत, प्रयुत, अर्बुद, अन्यर्बुद वृन्द, खर्व, निखर्व, शङ्कु, पद्म राशियाँ, संख्याएँ होती है। इनमें भी मध्यम, अन्त्य और परं और ऊपरं तथा उनसे परे भी परार्ध आदि तक इन संख्याओं को समझना जो एक एक से दस गुनी वृद्धि को प्राप्त होती है। उक्त श्लोक ज्यों के त्यों समराङ्गणसूत्रधार (9, 47-49) में आए हैं। अपराजित के इस अध्याय पर भास्कराचार्य कृत लीलावती का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। यही अध्याय सूत्रधार मण्डन कृत राजवल्लभ के 11वें अध्याय का मूल उत्स रहा है। नारदपुराण में यह क्रमवार गणना इस प्रकार आई है— एकं दश शतं चैव सहस्रायुतलक्षकम्॥ प्रयुतं कोटिसंज्ञां चार्वुदमब्जं च खर्वकम्। निखर्वं च महापद्मं शङ्कूर्जलाधिरेव च॥ अन्त्यं मध्यं परार्द्धं च संज्ञा दशगुणोत्तराः । (नारद, पूर्व. 54, 12-13)
सूत्र-४७ 235 अग्रेऽङ्काङ्क स्थापनीयस्तद्गुणैः पृष्ठपादतः । ऊर्ध्वमूर्ध्वं क्रमान्मूलं सङ्ख्या सङ्कलिता भवेत् ॥ 7 ॥ आगे-आगे अङ्कों की स्थापना करते हुए पीछे की संख्याओं के ऊपर से ऊपर की मूल से क्रमवार जोड़ते जाने से (या गुणा से) संख्या सङ्कलित होती है। एवं पादाश्च चत्वारो गणिताङ्कसमुच्यते । सङ्कलितं करणसूत्रामार्याद्वयंतैकोवृद्धिश्च ? । अधोयोगे सङ्कलीकृता तस्माद्देशोत्तरां च ? ॥ 8 ॥ इस प्रकार गणिताङ्क कहलाने वाले चार पाद होते है। सङ्कलित, करण सूत्र को, आर्याद्वय अन्त में एक की वृद्धि ? नीचे योग करे सङ्कलित करें, उसके भेदशः उत्तराच ? ।¹ अथ संख्यापद नामानि च - अग्रपृष्ठो अग्रकोत्तरा वा शून्यपृष्ठोक्त ? । भवेद् दशोत्तरा वृद्धी........ ? ॥ 9 ॥ एकराशिस्तु गणिते मूलं वर्गो द्विराशिकः । त्रिराशिकोऽथवोक्तश्च घनो वै कर्णसम्पुटे ॥ 10 ॥ आगे पीछे के आगे के बाद वा शून्य पृष्ठोवत्त ? । दशोत्तरा वृद्धि होती है ? एक ही संख्या से मूल संख्या को गणित करने से 'वर्ग द्विराशिक' बनता है। इसी तरह एक ही राशि को मूल से तीन बार गणित करने से घन संख्या बनती है, जो 'कर्ण सम्पुट' कहलाती है। पदद्वयं हते पादे पदैस्तद् गुणितं तथा। पदघ्नं च पदहतमित्यभिख्यं च राशिकम् ॥ 11 ॥ दो पाद को एक पाद से भाग देने पर जो संख्या आए, उसे पुनः पाद से गुणित करे तो उसे 'पदघ्न' तथा 'पदहत राशि' कहते हैं।
- यहाँ पाठ भ्रष्ट होने से नारदीय निर्देश को देखना चाहिए। यथास्थानीय अङ्कों का योग या अन्तर क्रम या व्युत्क्रम से करें। गुण्य के अन्तिम अङ्क को गुणक से गुणा करें। इसके बाद उसके पार्श्ववर्ती अङ्क को भी उसी गुणक से गुणा कर दें। इस प्रकार आदि से अङ्क तक गुणा करने पर गुणनफल लब्ध हो जाता है। इसी प्रकार भागफल जानने के लिए भी प्रयास करना चाहिए। जितने अङ्क से भाजन के साथ गुणा करनेपर भाज्य में से घट जाए, वही अङ्क लब्धि अर्थात् भागफल होता है। दो समान अङ्कों के गुणनफल को वर्ग कहा गया है। ज्ञानियों ने उसे ही कृति कहा है- क्रमादुत्क्रमतो वापि योगः कार्योत्तरं तथा॥ हन्याद्गुणेन गुण्यं स्यात्तेनैवोपान्तिमादिकान्। शुद्धेद्धरोयदगुणश्च भाज्यान्त्यातफलं मुने ॥ समाङ्कतोऽथो वर्गः स्यात्मेयाहुः कृतिं बुधः। अन्त्यात्तु विषमात्यक्त्वा कृतिं मूलं न्यसेत् पृथक् ॥ इत्यादि... (नारद. पूर्व 54, 14-16)
236 अपराजितपृच्छा द्वाभ्यां तु द्विगुणीकृत्य मूलभागोद्भवं पदम्। एवं मूलाभिधानं च वास्तुविद्भिरुदाहृतम्॥ 12॥ दोनों को दुगुना करके मूल भाग से निष्पन्न पद को 'मूलाभिधान' नाम से वास्तुशास्त्री जानते हैं। एवं यद् द्विगुणीकृत्य चतु ? र्द्विगुणमेव च। प्रख्यातं द्विगुणं चेति प्रयुक्तं गणितादिके॥ 13॥ इस प्रकार जब दुगुने किए जाए चार को ? इस द्विगुण राशि को गुणित करने वाले विद्वान 'द्विगुण' (पहाड़े की तरह) नाम से जानते हैं। कर्मान्तर व्यवहारं क्षेत्रं चाऽपि प्रदापयेत्। दीर्घं हन्यात्पृथुत्वेन वेदाश्रस्य फलं भवेत्॥ 14॥ कार्य करते समय व्यवहार क्षेत्र में भी इसे प्रयोग में लाना करना चाहिए। लम्बाई को चौड़ाई से गुणा करके चतुर्भुज क्षेत्र का फल प्राप्त होता है। सूत्र इस प्रकार है— लम्बाई × चौड़ाई = क्षेत्रफल। खातमानं तु पाषाणे गोलपिण्डैस्तु ताडयेत्। तदसङ्ख्याता कर्माणं पाषाणस्य तदन्तरम् ?॥ 15॥ पाषाण को खात-मान से अर्थात् खान से निकालते समय गोलपिण्ड से चोट करनी चाहिए, इसके लिए संख्या अंकित कर ही कार्य में लेना चाहिए। नवत्यङ्गुलदैर्घ्ये च पृथुत्वे चतुर्विंशतिः। द्वादशाङ्गुलपिण्डं च शिलामानप्रमाणतः॥ 16॥ नब्बे अङ्गुल की लम्बाई और चौबीस अङ्गुल की चौड़ाई (मोटाई) से बारह अङ्गुल का पिण्ड शिलामान प्रमाण से कहा है। यच्छिलायाः समानं च गणित्वा क्रमयोगतः। तेषां गुणितसङ्ख्याश्च पाषाणाश्च क्रमोदिताः॥ 17॥ जिस शिला के समान ही क्रम योगानुसार गणित करके जो गुणित संख्या आए, उसे पाषाण की क्रमोदिता संख्या कहते हैं। दीर्घं द्वादशको भागः षड्भागश्चैव विस्तरः। पिण्डस्य तुर्यो भागश्च अन्योन्मपि ताडयेत्॥ 18॥ बारह भाग की लम्बाई और छह भाग की चौड़ाई से पिण्ड के चार भाग को एक दूसरे से ताड़न करें।
सूत्र-४७ 237 दीर्घहस्तान् पृथुत्वेन पुनः पिण्डेन ताडयेत्। द्व्यष्टाशीतिशतैर्भागं लब्धिरङ्गुलसङ्ख्यिका ॥ १९ ॥ पृथुपिण्डे ताड्यमाने वृन्द्धिहाससमुद्भवे। शिलानां क्रमयोगे तु खातमानं तथोच्यते ॥ २० ॥ दीर्घस्थान बड़े गज की संख्या 24 की मोटाई पुनः 24 से ताड़न करने पर एक सौ बयासी (182) भाग को अङ्गुल संख्यिका कहते है। मोटाई पिण्डमान को ताड़न से वृद्धि और ह्रास बनता है, उसे शिलाओं के क्रमयोग से 'खात-मान' कहा जाता है। पिण्डाङ्गुलैर्दीर्घहस्ता गुणितव्याः प्रयत्नतः। पृथुह्रस्ववृद्ध्यार्धा च धत्ते मानं शिलादिकम् ॥ २१ ॥ इति शिलामानः। दीर्घहस्त-गज के 24 अङ्गुल पिण्ड से गुणित करके मोटाई के ह्रस्व, दैर्घ्य को आधा करने पर शिलादिक मान लब्ध होता है। वृत्तदीनां फलानयनं – व्यासे त्रिगुणे परिधिः षष्ठभागविमिश्रिते। व्यासार्धं च परिध्यर्धं गुणे वृत्तफलं भवेत् ॥ २२ ॥ व्यास की तिगुनी परिधि षष्ठांश युक्त होती है। व्यासार्ध और परिधि का अर्ध गुणा करने पर किसी भी वृत का क्षेत्रफल आता है। समस्ता वृत्तपरिधिर्गुणिता व्यासपादतः। हरेच्चतुर्विंशतिभिर्लब्धमङ्गुलतत्फलम् ॥ २३ ॥ समस्त वृत्त की परिधि को व्यास के चतुर्थांश से गुणित करके चौबीस अङ्गुल से भाग देने पर जो लब्धि आए उतने अङ्गुल उसका फल समझना चाहिए। व्यासे वर्गस्य ? गुणिते चतुर्थांशं तु पातयेत्। शेषेऽष्टादशके भागे क्षिप्ते वृत्तफलं भवेत् ॥ २४ ॥ व्यास को वर्ग गुणित करके चतुर्थांश घटा दे, फिर शेष के अठारह भाग करने पर वृत्तफल बनता है। व्यासवर्गहस्तैकोनपञ्चाङ्गुलानि पातयेत्। शेषं यल्लभ्यते तच्च वृत्तस्यापि फलं भवेत् ॥ २५ ॥ वर्ग हस्त 24 × 24 को व्यास से एक कम पञ्चाङ्गुली (चतुर्थांश) से भाग दे, जो शेष प्राप्त हो, वह वृत्त का फल होता है।
238 अपराजितपृच्छा तस्यास्तु(स्नु)वौलेनहितं खातकूपफलं भवेत् । पाषाणपिण्डहतं वा शिलामानं तु सङ्ख्यया ॥ २६ ॥ उपर्युक्त विधि से कूप के खात परिणाम प्राप्त होता है। जो पाषाण पिण्डमान से भाग देने पर शिला मान की संख्या आती है। भूवदन समासार्धं च लम्बकेनात्र गुणितम् ? । कुद्दलं लम्बहतं च जायते क्षेत्रफलम् ॥ २७ ॥ भूवदन के समान ही आधा और ले और उसे लम्बक से गुणित करे (?) , तो कुद्दलं लम्बहत क्षेत्रफल आता है। तविवेधगुणितं च खातफलं प्रसिद्धयेत्। समविषमाधवेधैः पदैर्विषमवेधकैः ॥ २८ ॥ इस प्रकार से वेध के गुणित करके खातफल आता है। सम-विषम आध वेधों में पदों में विषम वेध कहा है। गोलव्यासवर्गगुणं ताड्यं व्यासार्धपिण्डकम् । द्विशताष्टाशीतिहृतं लब्धं गोलफलं भवेत् ॥ २९ ॥ गोल और व्यास के वर्ग को गुणित कर व्यासार्ध पिण्डक को भाग दें। उससे दो सौ अस्सी (280) निकाल लें तो गोलफल की लब्धि होती है ॥ २९ ॥ व्यासवर्गे तु गुणितं फलमेकं ? प्रकीर्तितम् । षड्भागं द्विरसं त्यक्त्वाऽष्टाश्रे क्षेत्रफलं भवेत् ॥ ३० ॥ इत्यष्टाश्रक्षेत्रम् । व्यास के वर्ग को गुणित करके एक फल कहा जाता है। इसके बारह (द्विरसं) के छह भाग को छोड़ने पर अष्टाश्र क्षेत्र का क्षेत्रफल आता है। षडंशमेकशेषं च त्यक्त्वा सूत्रापरः शिखा ? । दीर्घ पृथुत्वे गुणितं षडश्रे क्षेत्रजं फलम् ॥ ३१ ॥ इति षडश्रक्षेत्रम् । षडंश में एक शेष को अर्थात 1 ¹/⁶ छोड़कर सूत्र पर शिखा ? लम्बाई को मोटाई से गुणित करने से षडश्र क्षेत्रफल बनता है। वर्गमूलफलं त्यक्त्वा षड्भागं शक्रांशं त्यजेत् । शेषं फलं विजानीयात् क्षेत्रे वै षोडशाश्रके ॥ ३२ ॥ इति षोडशाश्रक्षेत्रम् ।
सूत्र-४७ 239 वर्गमूल फल को छोड़कर छह भाग शक्रांश (14वाँ या 13वाँ) भाग या 1/13 छोड़ दे, शेष को षोडशाश्र का क्षेत्रफल समझे। चापाकारे यदा क्षेत्रे पृथुत्वं मध्यपादतः। त्रिभागं द्विगुणं कृत्वा पृथुत्वं चैव साधयेत्॥ ३३॥ जब धनुषाकार क्षेत्र हो और मोटाई मध्य पाद जितनी हो तो उसके तीन भागों को दुगुना करके मोटाई को ज्ञात करना चाहिए। पादान्तं गुणिताग्रं च मध्ये गुणं पृथु मध्यम ?। वामे च द्विगुणं दीर्घ चापाकारे क्षेत्रफलम्॥ ३४॥ इति चापाकारक्षेत्रम्। पादान्त तक गुणित करके मध्य में मध्यम गुणित कर? बायीं ओर दुगुनी चौड़ाई वाला चापाकार क्षेत्रफल बनता है। षड्बृहद्भुजार्धवासं भिन्नैः शीर्ष शिखान्तकैः। पृथुदीर्घगुणिते त्रिकोणे क्षेत्रफलं भवेत्॥ ३५॥ इति त्रिकोणक्षेत्रम्। बृहद् भुजार्धवास को अर्थात 24/2 को छह से गुणित करके शिखान्त तक मोटाई व लम्बाई को गुणित करके त्रिकोण क्षेत्रफल बनाएँ। दीर्घ समभुजान्ते च पृथुत्वं मध्यस्थाके। पृथुपादं परित्यज्य षडंशं च पुनर्ददेत्॥ ३६॥ इत्यर्धचन्द्रक्षेत्रम्। समभुजान्त तक लम्बाई और मध्य स्थान तक की चौड़ाई का चतुर्थांश छोड़कर षष्ठांश को पुनः जोड़ दें।¹ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां गणितक्षेत्रनिर्णयाधिकारो नाम सप्तचत्वारिंशं सूत्रम्॥ 47॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गणितक्षेत्रनिर्णय अधिकार नामक सेंतालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ॥ 47॥
- गणित का यह वर्णन पर्याप्त रूप से त्रुटित है। इसे विशेष रूप से भास्करकृत लीलावती नामक ग्रंथ में देखना चाहिए। इसके लिए श्रीपति कृत गणिततिलक और सिद्धान्तशेखर ग्रंथ भी देखे जा सकते हैं।
240 | अपराजितपृच्छा
भूपरीक्षाग्रहपूजा नामाष्टचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 48 ॥ विश्वकर्मोवाच। ग्रहणयोग्यपर्वताश्रितभूप्रदेशमाह — महेन्द्रो मलयश्चैव सिंहश्च विक्रमस्तथा। समुद्रः पारिजातश्च श्रीशैलश्च तथार्बुदः ॥ 1 ॥ नीलश्च श्वेतशृङ्गश्च चन्द्रः प्रभाससम्भवः। गन्धमादनोजयन्तौ प्राप्ता श्वेतसम्भवः ? ॥ 2 ॥ विश्वकर्मा बोले कि पर्वतों में (1.) महेन्द्र, (2.) मलय, (3.) सिंह, (4.) विक्रम, (5.) समुद्र, (6.) पारिजात, (7.) श्रीशैल, (8.) अर्बुद, (9.) नील, (10.) श्वेतशृङ्ग, (11.) चन्द्र, (12.) प्रभाससम्भव, (13.) गन्धमादन और (14.) जयन्त— ये श्वेत से उत्पन्न हुए हैं। (इनके क्षेत्रों को ग्रहण की दृष्टि से विचारणीय जानना चाहिए।) गङ्गाया यमुनायाश्च नर्मदायास्तटे तथा। गोदावर्याः सरस्वत्याः सिन्धौ पृष्ठे तथैव च ॥ 3 ॥ तापी मही तुङ्गभद्रा कावेरी चन्द्रभागिका। पयस्वती साभ्रमती कृष्णा नीरा च निर्मला ॥ 4 ॥ भीमाक्षी सिंहिका ख्याता नीलोद्भवा च वेत्रकी। रेवती मधुरा ख्याता विश्वामित्री च मूलका ॥ 5 ॥ (ग्रहणयोग्य नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों के विषय में कहा जा रहा है) गङ्गा के, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, सरस्वती, सिन्धु, तापी, मही, तुङ्गभद्रा, कावेरी, चन्द्रभागा, पयस्वती, साबरमती, कृष्णा, नीरा, निर्मला, भीमाक्षी, सिंहिका, नीलोद्भवा व वेत्रकी के, रेवती, मधुरा नाम से विख्यात विश्वामित्री और मूलका (के क्षेत्र परीक्षण के योग्य हैं।) नद्यादीनां भूक्षेत्रं — कुरुक्षेत्रे च गङ्गायामन्वेद्यां तथैव च। नैमिषे कुब्जाम्रकेषु महाकालवने तथा ॥ 6 ॥ सिद्धायतनतीर्थेषु नदीनां सङ्गमेषु च। उर्वरीषु श्मशानेषु चत्वरे उदकाश्रिते ॥ 7 ॥ सुपदेशे शुभ रम्ये गह्वरे गिरिमाश्रिते। वने चोपवने चैव यत्र वा रोचते मनः ॥ 8 ॥
सूत्र-४८ 241 इसी प्रकार कुरुक्षेत्र में, गङ्गा के अञ्चलों, नैमिषारण्य, कुब्जक्षेत्र, आम्रक (उत्कल क्षेत्र) तथा महाकाल¹ के वनों में, सिद्धायतन, तीर्थों में और नदियों के संगमों पर, उर्वरी में, श्मशानों में, चौराहों पर, जलाशयों के निकट, सुन्दर भूभागों पर तथा पहाड़ियों में स्थित गुफाओं में, वनों तथा उपवन-बाग-बगीचों और जहाँ कहीं भी मन लग जाय ऐसे सुलभ स्थान पर (भूमि को ग्रहण करने पर विचार करना चाहिए।) नगरग्रामपूर्मध्ये खेटके चैव कर्वटे। तडागकूपमाश्रित्य प्रसिद्धनृपमार्गके ॥ 9 ॥ प्रपादे कुलसम्भवे कुर्याद्वैशवमण्डपम्। जनालयदिक्कुड्यानि वापिद्वार्युता तथा ॥ 10 ॥ कोई नगर-पुर या ग्राम हो, खेटक (खेड़ा) अथवा कर्वट हो, उनके बीच और प्रसिद्ध राजमार्ग पर तालाब और कूपों को बनाया जाना चाहिए। यदि राजकुलों के अपने' शवमण्डप या समाधियों का क्षेत्र हो तो वहाँ पर बावड़ी हो और जनालय (लोगों का आवास और धर्मशाला हो) या चारदिवारी हो तो द्वारों सहित बावड़ी बनवाएँ।² शुभे दिने शुभे ऋक्षे सुलग्ने सुमुहूर्तके। आदौ च भूपरीक्षायां शकुनं हि विलोकयेत् ॥ 11 ॥
- महाकाल के वनों का वर्णन स्कन्दपुराण के आवन्तिखण्ड में सम्यक् प्रकार से आया है।
- देवालयचन्द्रिका में कहा गया है कि किसी तीर्थ की सीमा में, नदी के तट पर, सरोवर के तीर पर, नदियों के सङ्गम पर, पर्वतों व पहाड़ों के आगे, वन-उपवन, उद्यानों में और सिद्धों के आश्रम या गुरुकुल, ग्राम, पुर, पत्तन अथवा देश में कहीं सुन्दर स्थल पर देवताओं के लिए प्रासाद निर्माण के लिए भूमि का चयन करना चाहिए। ऐसी भूमि देवालयों के निर्माण की दृष्टि से श्रेष्ठ है जहाँ पर कर्पूर, अगरु, नारियल, तिलक, दर्भ, कदम्ब, अर्जुन, मालेय, क्रमुक या सुपाड़ी, इक्षु, केतकी, कुश, कुन्द, कमल, उत्पलादि की उपज होती हों। ऐसा स्थल जहाँ पर कि जल का प्रवाह पूर्व की ओर होता हो अर्थात् भूमि का प्लव पूर्व की ओर हो, जो भूमि बहुत जल वाली हो अथवा जहाँ उचित सुविधाएं हों, शान्ति हों, देवाधिपति का यजन होता हो और कमलों से परिपूर्ण पृथ्वी हो, वह देवालय के लिए सर्वथा उचित है— तीर्थान्ते तटिनीतटे जलनिधेस्तीरे सरित्सङ्गमे शैलाग्रेऽद्रितटे वनोपवनयोद्यानदेशे तथा। सिद्धाद्यायतनेषु वा गुरुवरो ग्रामे पुरे पत्तने देशेऽन्यत्र मनोरमे सुरसमिज्यायै क्षितिं कल्पयेत्॥ कर्पूरागरुनालिकेर तिलकैर्दर्भैः कदम्बार्जुनैर्मालेयैः क्रमुकेक्षुकेतककुशैः कुन्दारविन्दोत्पलैः। पूर्वोदक्प्लवशालिनी बहुजला वा या दरीदृश्यते सेयं शान्तिकरी सुरेशयजने सूक्ता सुपद्मा मही॥ तीरे वारिनिधेः श्रिताथ सरितस्तीर्थस्य वा दक्षिणे व्रीहि- क्षेत्रविचित्रिताप्यदिशि यज्ञार्हाङ्घ्रिपैरङ्किता। कीर्णा पूर्वफलप्रसूतनरभिर्योद्यानहृद्यापि वा भद्रा सा परिगीयते वसुमती प्रीतिप्रदा यज्वनाम्॥ (देवालय. 2-4 एवं तन्त्रसमुच्चय 1, 28, 39-40)
242 अपराजितपृच्छा (अब भूमि परीक्षाविधि के प्रसङ्ग में कहा जा रहा है) इस शुभ कार्य के लिए शुभ दिन, शुभ नक्षत्र, सुलग्न और सुमुहूर्त का अवश्य ध्यान रखें। पहले भूपरीक्षा के लिए शकुनों को अच्छी प्रकार से देख लें। पूजाबलिविधानेन शकुनेशं तथा परम्। दुर्लभं लभते वत्स विश्वकर्मप्रभाषितम् ॥ 12 ॥ शकुन के लिए भी पूजा बलि विधानपूर्वक शकुनेश का तथा परमतत्त्व का ध्यान करें। हे पुत्र! समझ लो कि विश्वकर्मा के द्वारा कही गई यह शिक्षा बड़ी दुर्लभ है जिसका तुम्हें लाभ मिलेगा। आदावुत्तरतो वत्स पश्चाद्दक्षिणतो भवेत्। उत्तरे सिद्धिसम्पत्तिः क्षेमलाभस्तु दक्षिणे ॥ 13 ॥ हे पुत्र! इसके लिए पहले उत्तर दिशा और बाद में दक्षिण दिशा की ओर जाना चाहिए। उत्तर में सिद्धि, सम्पत्ति और दक्षिण में क्षेम-कुशल का लाभ होता है। पुनः शब्दोत्तरे स्थाने शकुनस्यापराजित। सर्वकामफलं तत्र शकुनेशे न संशयः ॥ 14 ॥ हे अपराजित! पुनः यदि शब्द उत्तर दिशा से आता हो तो उस स्थान का शकुन सब कामनाओं की पूर्ति करने वाला, फलदायक है, ऐसा शकुनेश का निश्चित सङ्केत समझना चाहिए। प्राप्ते शकुनराजे तु सुलग्ने सुमुहूर्तके। आचार्ये चागमैर्युक्ते बलिपूजां निवेदयेत् ॥ 15 ॥ इस प्रकार से सर्वोत्तम शकुनराज को प्राप्त करके, सुलग्न और सुमुहूर्त में आचार्य के आगमन पर उन्हें बलि-पूजा निवेदित करें। सूत्रधारलक्षणम् — सूत्रधारः शास्त्रयुक्तो वास्तुवेदोपलक्षकः। सूत्रकम्बीसमायुक्तः सर्वशास्त्रसुकौशलः ॥ 16 ॥ तदा क्षेत्रे प्रतिष्ठा तु पुण्यस्थाने सुशोभने। आचार्यसूत्रधारैश्च कृता पूजा महोदिता ॥ 17 ॥ इस अवसर पर समस्त शिल्पशास्त्रों में कुशल, वास्तु वेद में वर्णित समस्त उपलक्षणों को समझने वाला, सूत्र और गज के सही-सही प्रयोगकर्त्ता सूत्रधार शिल्पशास्त्री को उस स्थान में पवित्र और शोभायमान मञ्च पर प्रतिष्ठित करके अन्य सभी सूत्रधार, आचार्यों के साथ महापूजा, सम्मान करना चाहिए।
सूत्र-४८ 243 आदौ तु पूजयेद् देवं गणनांथं विनायकम् ॥ सिद्धिबुद्धिसमायुक्तं मुदा विधिविधानतः ॥ 18 ॥ इस क्रम में सर्वप्रथम गणनांथ विनायक का पूजन करें जिनके साथ में सिद्धि व बुद्धि भी विराजमान हो। इस पूजा को बड़े आनन्द और प्रसन्न मन से विधि-विधान पूर्वक करना चाहिए। ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च पूजनीयाः प्रयत्नतः । येषां स्मरणमात्रेण सर्वसिद्धिः प्रजायते ॥ 19 ॥ तदन्तर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रदेव की प्रेम-प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए जिनके स्मरण मात्र से सब प्रकार की सिद्धि हमें मिलती है। क्षेत्रपालं ततोऽभ्यर्चेत् लाभार्थी सुजटाधरम् । योगिनीर्बटुकं देवीः कुमारीः सविशेषतः ॥ 20 ॥ फिर, लाभार्थी यजमान सुजटाधर, क्षेत्रपाल की अभ्यर्चना करें तथा सभी चौंसठ योगिनियों, बटुकों, देवियों और कुमारियों की विशेष तौर पर पूजा-अर्चना करें। सर्वदेवास्ततः पूज्या दिक्पालांश्च ततोऽ
३. सूत्र १०१-१६०: समवसरण, मण्डप-लक्षण, स्तम्भ-माला एवं प्रासाद-शृंगार
244 अपराजितपृच्छा सूत्रों¹ के जानकार सूत्रधार, गजधर कर्मान्त्रि का पूजन करना चाहिए और उनके प्रयोग में आने वाले गज (हस्त) का भी पूजन करना चाहिए। भूमिदानं ततो दद्याद् गोमहिष्यश्वसंयुतम्। हिरण्यवस्त्रछत्राद्यैर्महादानैः क्षमापयेत् ॥ 25 ॥ इस अवसर पर सूत्रधार को भूमिदान, गो-महिष-अश्वयुक्त स्वर्णाभूषण, वस्त्र- पेरावणी, छत्रादि महादान श्रद्धापूर्वक देना चाहिए। वन्दितान् पूजयेद्वत्स सुभक्त्या क्षितिपालकैः । कृपा च सर्वजन्तूनां कर्त्तव्या सिद्धिमिष्यतैः ॥ 26 ॥ इसी तरह हे वत्स ! इस अवसर पर क्षितिपालक, भू स्वामी यजमान द्वारा सभी आगन्तुक वन्दनीय महानुभावों, अतिथियों की भक्तिपूर्वक पूजा-अर्चना करनी चाहिए और समस्त जीव-जन्तुओं पर दया-करुणा का भाव रखते हुए सिद्धि की आकांक्षा रखनी चाहिए। पश्चाद् दानं तथा कुर्याद् दीनान्धकृपणेषु च। ततः कामं समारभ्य चाष्टसूत्रं विधिक्रमम् ॥ 27 ॥ इसके बाद में दीन-अन्ध और निर्धन व्यक्तियों को दान-पुण्य करके ही अष्टसूत्र विधि-क्रमानुसार शिल्प कर्म का समारम्भ करना चाहिए। पूजा बलिविधानं च कृत्वा दीनान्धकृपणेषु च। सर्व सिद्ध्यति तत्कर्म सर्वकामफलप्रदम् ॥ 28 ॥ पूजा, बलि-विधान के साथ जो काम किए जाते हैं, वे सभी काम सिद्ध होते हैं और ऐसे काम सभी कामनाओं की पूर्ति करते हैं। स्थिरे चित्ते सुधीस्तत्र स्फुरति विपुलाऽमला। नित्यं पुंसां यदुक्तं गुरुणा विधानं दैवेन या निर्मिता ? ॥ 29 ॥ इस प्रकार पूजन विधान के समारोह और उत्साह से, स्थिरचित से आरम्भ किए गए कार्य में समय-समय पर बड़ी ही विमल बुद्धि भी आवश्यकतानुसार स्फुरित होती रहती है। इससे हमेशा गुरुजनों द्वारा कही गई, देवताओं द्वारा निर्मित विधान के अनुसार लोगों को नित्य नई दृष्टि मिलती रहती है। शास्त्रगणितमूर्द्धि मपरे स्वस्थे बुद्धिशोभना।
- अष्टसूत्रों में 1. दृष्टिसूत्र, 2. गज, 3. मूँज की डोरी, 4. सूत की डोरी, 5. अवलम्ब या साउल, 6. गुणिया, 7. साधणी और 8. परकाल या विलेख्य को गिना गया है। शिल्पस्मृति में कहा गया है- दृष्टि : करस्तथा मौञ्जं कार्पासञ्चाबलम्बकम्। काष्ठसृष्टिविलेख्यानि सूत्राण्यष्ट वदन्ति च ॥ (शिल्प. 2, 107)
सूत्र-४९ 245 नित्यं स्फुरति दर्पणे मनःस्था महतामपि न विसाद्भूताः ? ॥ 30 ॥ यह एक महत्वपूर्ण नियम है कि महात्मा लोगों में बड़े ही अद्भुत ढङ्ग से शास्त्रगणित के मूर्धन्य जानकारों और दूसरे स्वस्थ बुद्धि शोभन महानुभावों के सभी गुण नित्य नए-नए स्फुरित होते रहते है, मानो ये सभी विचार उनके मन रूपी दर्पण में उन्हें दिखाई पड़ते हैं। तेनेदं सिद्धयते सर्व वास्तुस्थानपरिग्रहम्। पूजादानैश्च सूत्रश्च संयोगैः प्रभूरभूत्तयोः ? ॥ 31 ॥ इन्हीं स्फुरित विचारों से समस्त वास्तुशास्त्र के परिग्रह, काम-काज सिद्ध होते हैं। पूजा, दान, सूत्रादि तो इस संयोग में प्रभुतापूर्वक विशेष लाभदायक हैं। सर्वार्थे पोषयेद् भृत्यो ये केचित् कर्मदायकाः। कर्मकरांस्ततो वत्स सर्वार्थे नित्यं पोषयेत् ॥ 32 ॥ अन्त में, कार्य सिद्धि का मूल मन्त्र देते हुए श्रीविश्वकर्मा भगवान् अपराजित को कहते हैं कि हे पुत्र ! जो भी कोई भृत्य कैसे भी काम में लगाया गया है, उसे सभी तरह से पोषण देना, अच्छा भर-पूर वेतन देना और समस्त कर्मकारों, कारीगरों को भी पूरा-पूरा वेतन देकर उनके पोषण हेतु उनके सभी अर्थों की नित्य पूर्ति करते रहना सदा ही लाभप्रद रहता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां भूपरीक्षाग्रहपूजाधिकारो नामाष्टचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 48 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में भूपरीक्षाग्रह पूजा अधिकार नामक अड़तालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 48 ॥ सूत्रधारपरीक्षा नामैकोनपञ्चाशं सूत्रम् ॥ 49 ॥ विश्वकर्मोवाच — कर्माधिपस्य कर्तव्या परीक्षा शिष्यवत्तथा। त्रिभावे निःस्पृहो दक्षः कर्तव्यः कर्मनायकः ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि जिस व्यक्ति को कर्माधिप नियुक्त किया जाता है अर्थात् वास्तुकर्म के लिए गजधर बनाया जाता है, उसकी परीक्षा उसके शास्त्रज्ञान, कर्म, कर्तव्य, ईमानदारी, दक्षता आदि के बारे में एक शिष्य की परीक्षा की भाँति ही तीन भावों से की जानी आवश्यक है।
246 अपराजितपृच्छा चतुर्विधपरीक्षणं — यथा चतुर्भिः कनकं शिष्यवच्च परीक्ष्यते । ताडनच्छेदतापैश्च घर्षणैः पुरुषस्तथा ॥ २ ॥ जिस तरह सोने को और शिष्य को चार प्रकार से परीक्षा करके देखा जाता है, यथा— ताड़न, छेदन, तपाना और घिसना, उसी प्रकार पुरुष की भी इन चार प्रकारों से परीक्षा करनी चाहिए। भृत्यलक्षणं — उद्यमः साहसं धैर्यं बलं बुद्धिः पराक्रमः । यस्मिन् भृत्ये चिह्नषट्कं तस्माद् देवोऽपि शङ्कते ॥ ३ ॥ जिस भृत्य में अर्थात कर्म कार्य में नियुक्त कर्मकर में उद्यम, साहस, धैर्य, बल, बुद्धि और पराक्रम— ये छह चिह्न पाए जाते हैं, उससे तो देवता भी भय खाते हैं अर्थात् आशङ्कित रहते हैं। पूर्वं परीक्षितो भृत्यस्तस्य द्रव्यं निवेदयेत् । स्वामिकार्यकरो नित्यमसाध्यं साधयेद् ध्रुवम् ॥ ४ ॥ पहले कर्मकर या भृत्य की ठीक परीक्षा कर लेनी चाहिए। उसमें यदि वह पूर्णतः सफल सिद्ध होता है, तो उसको उसका वेतन अवश्य बता देना चाहिए जो उसकी योग्यता के उपयुक्त हो क्योंकि समुचित एवं पुष्कल वेतन पाने वाले कर्मकर सदा स्वामीभक्त, स्वामी के कार्य को कुशलता से पूरा करने वाले, प्रत्येक अवसर पर उपलब्ध रहकर काम को सफल बनाने वाले, असाध्य कामों को भी अवश्य ही साधने वाले और निश्चयपूर्वक कर दिखाते हैं। सुशीलः सुगुणो भृत्यः सुकुलः सत्यताधिकः । सोद्यमो विनयैर्युक्तो विभवे निःस्पृहो ध्रुवः ॥ ५ ॥ परदारधनत्यागी प्रियालापी च देशजः । स्वामिकार्यकरो नित्यं त्रैलोक्यं तस्य शङ्करम् ॥ ६ ॥ जिस कर्मकर में सुशीलता, सुगुण, सुकुल, सत्यवादिता, उद्यमिता, विनय और वैभव में भी सरलता, निस्पृहता दृढ़ हो, वह पराई स्त्रियों, पराए धन का त्यागी एवं प्रियवाणी बोलने वाला होता है। मुख्य बात यह कि वह उसी क्षेत्र का निवासी अर्थात् देशज हो जो क्षेत्र की पूरी जानकारी रखता है। वह स्वामी का कार्य सदा सफल करके दिखाता है और तीनों लोकों में शान्तिकारक होता है।
सूत्र-४९ 247 सुभृत्यः सुगुणैर्युक्तः शीलवांश्च विवेकवान्। क्रमजातकुले जातो महासत्यप्रियंवदः ॥ 7 ॥ अच्छा कर्मकर या भृत्य, सुगुणों से युक्त हो, शीलवान, विवेकवान, उत्तम कुल में जन्मा हो, महा सत्यवादी और मधुरवाणी में बोलता हो। संयमैर्नियमैर्युक्तस्त्रीभावे निःस्पृहो ध्रुवम्। स्वामिकार्यकरो नित्यं त्रैलोक्यं तस्य गोचरम्॥ 8 ॥ वह संयम, नियम से रहता है और स्त्री जाति के प्रति सदा दृढ़ता पूर्वक निस्पृही हो, वह एक ऐसा स्वामी का कार्य करने वाला व्यक्ति होता है जिसे तीनों ही लोकों के बारे में सही, सूझबूझ वाली दृष्टि हो। प्रारब्धं तु भवेद् यावत्तावद् वन्द्येषु भावना। तादृशं कारयेद्भावं खलु देवेषु यादृशम्॥ 9 ॥ प्रारब्ध तो तभी तक काम करता है जब तक कि आपकी भावना वन्दनीय लोगों के प्रति भक्ति और प्रेमपूर्वक है। यह नियम ही समझो, आप जिस तरह की भावना देवताओं के प्रति रखेंगे, उसी तरह वे भी आप पर भी अनुकम्पा करते हैं।¹ देवपादे स्वरूपेण पूर्णभावे सदास्थितः। अर्थसामर्थ्यदानेन स्वामिपुण्यं तु धार्यते ॥ 10 ॥ जो देवता के चरणों में और स्वरूप में पूर्णश्रद्धा भाव से हमेशा स्थिता रहता है और अपने सामर्थ्यानुसार अर्थ का दान करके वह स्वामी के पुण्यों को धारण करने का अधिकारी हो जाता है। सुदानेषु रतो नित्यं सुभृत्यः प्रभुकाम्ययोः ?। स्वामी सुहृत्संयोगे तु जल्पे किंकरतां व्रजेत् ॥ 11 ॥ जो सुभृत्य, कर्मकर नित्य सुदान में लगा रहता है और अपनी स्वामी की सेवा पूरी करता है, तो इससे स्वामी-सेवक को आपसी प्रेम संयोग शीघ्र ही हो जाता है। वह कर्मकर, सेवक अपने स्वामी के साथ बातचीत करने में सदा नम्रता, आदरयुक्त व्यवहार करता है। स्वयं धराधिपो वत्स बहुकर्मसु संस्थितः। नित्यं सन्मानोद्यमनधर्मकर्मादिकारकः ॥ 12 ॥
- श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो मुझे जिस भाव से भजता है, मैं भी उसे उसी भाव से भजता हूँ— ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥ (गीता 9, 29)
248 अपराजितपृच्छा स्वयं क्षेत्र का स्वामी तो हे वत्स ! बहुत से कार्यों में व्यस्त रहता है, अतः उसे नित्य धर्म, कर्मादि करने वाले कर्मकारों का सम्मान का उद्यम करते रहना चाहिए। दातव्यं वस्त्रताम्बूले खाद्यं पानं दिने दिने। सन्मानं जन्मतो दद्यात् प्रियालापैः सुनित्यशः ॥ 13 ॥ उनको वस्त्र, ताम्बूल, खाद्य वस्तुओं और पान योग्य पेय पदार्थ प्रतिदिन देते रहकर खुश रखना चाहिए। (व्यवहार के रूप में) किसी जन्म से कुलीन व्यक्ति को सम्मान देकर, किसी से मधुरवाणी में बात करके तो किमी किमी के कार्य की प्रशंसा करके सदा प्रसन्न रखना चाहिए। इत्यमनन्तर सुभाषितानि - असहाये कुतः सिद्धिर्धनहीनः पराजितः। पुष्कलं साधनं यस्य सिद्धिस्तस्य करे स्थिता ॥ 14 ॥ क्योंकि, यह नियम है कि सहायकों के अभाव में सिद्धि कैसे मिल सकती है और धन के अभाव में व्यक्ति सदा पराजित होता रहता है। इसलिए जिसके सहायक और धन का पुष्कल साधन है, सिद्धि भी उसके ही हाथ में आती है। बहुवित्तचयो वत्स बुद्धिसोद्यमसाहसैः । सूत्रमन्त्रं सुभृत्यैश्च स्यात्सदा च सुखी नृपः ॥ 15 ॥ इसलिए हे वत्स ! अपार धन का संग्रह करो और इसी में अपनी बुद्धि और साहस को उद्यमपूर्वक लगाओ जिससे शिल्पशास्त्र के सभी सूत्र, मन्त्रादि और अच्छे कर्मकर, भृत्य सदा ही उपलब्ध होते रहे, जिससे राजा भी सुखी रहे और कर्मकर भी सुखी रहे। सर्वकार्येषु निबन्धं त्रिकालज्ञः सदा भवेत्। वर्तमानं तथातीतं भाव्यं नित्यं विलोकयेत् ॥ 16 ॥ सभी कार्यों पर पूरा प्रबन्ध बनाए रखना चाहिए, सदा ही व्यक्ति को त्रिकालज्ञ या भूत-भविष्य-वर्तमान का ज्ञानवान होना चाहिए ताकि वर्तमान को अतीत की तुलना में देखते हुए भविष्य की पूरी तैयारी हो सके। प्रारम्भे सर्वकार्याणां सर्वोपकरणैर्युतः। आदिमध्यान्ततः पृष्टा कृत्यान्तं कारयेद् बुधः ॥ 17 ॥ समझदार व्यक्ति सदा सभी कार्यों के प्रारम्भ करने के समय सभी प्रकार के उपकरणों का संग्रह कर लें जिससे कार्य को आदि से लेकर मध्य और अन्त तक पहुँचाकर कृत-कृत्य हो सके।
सूत्र-५० 249 बुद्धिकामी भवेन्नित्यं सर्वत्रैवापराजित। व्यवहारे निर्मला ये ते भृत्या वसुधाधिपाः ॥ १८ ॥ हे अपराजित ! सर्वत्र जो व्यक्ति बुद्धि का सदा प्रयोग करता रहे और अपना व्यवहार निर्मल रखे, वे ही अपने सेवक और वसुधा के स्वामी कहे जा सकते हैं। अर्थेन वर्धते चार्थ सन्मानैर्वन्दिता भया ? । व्यवहारे वर्धते लोकश्चतुरङ्गः प्रियागमः ॥ १९ ॥ यह तो एक ध्रुव सत्य है कि अर्थ से ही अर्थ की वृद्धि होती है और सम्मान से और वन्दन से निर्भयता बढ़ती है। इसी तरह सद्व्यवहार से परस्पर प्रेम और निर्मलता बढ़ती है और लोक के चारों अङ्ग— धर्म, अर्थ, काम, मोक्षादि तथा प्रियजनों का आगमन बना रहता है। तेषां सुसिद्ध्यति सर्वमसाध्यं साध्यं नित्यशः। दानसन्मानमात्रेण देवोऽपि च सन्मानयेत् ॥ २० ॥ ऐसे ही मनुष्यों के सब साध्य और असाध्य काम नित्य साध्य होते रहते हैं क्योंकि दान और सम्मान मात्र ही देवताओं का भी सम्मान हो जाता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सूत्रधारपरीक्षाधिकारो नामैकोनपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ४९ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सूत्रधार परीक्षा अधिकार नामक उनचासवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥ सूत्रधारलक्षणात्मकं पञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५० ॥ विश्वकर्मावाच — शृणु वत्स यथान्यायं सूत्रधारस्य लक्षणम्। शास्त्रज्ञः कुशलो दक्षो वास्तुविद्याविबोधकः ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने कहा— हे वत्स ! न्यायतः सूत्रधार के जो लक्षण होते हैं उन्हें सुनो ! सूत्रधार शास्त्रज्ञ हो, कुशल हो, दक्ष हो और वास्तुविद्या को समझने-समझाने वाला होना चाहिए। सूत्रधारो महाप्राज्ञः षट्कर्मसु निरन्तरम्। यो नित्यं त्यमरतत्त्वं ¹सादृष्टोऽपि महालयम् ॥ २ ॥
- 'सामृष्टोऽपि तधालयम् ?' इति प्रकाशित पाठः।