अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
DevanagariHindipublished535 पृष्ठ
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234 अपराजितपृच्छा अथ गणितपादं — आदौ गणितपादं च कथयिष्याम्यनुक्रमात् । तदन्तराणि क्षेत्राणि कथये विविधानि च ॥ ३॥ इसमें सबसे पहले 'गणित पाद' भाग को अनुक्रम से कहता हूँ, उसके बाद विविध प्रकार के क्षेत्रों के विषय में कहूँगा। एकात्पर्द्धादीनां गणनामाह — एकं दश शतमस्मात् सहस्रमनु चायुतम् । नियुतं प्रयुतं तस्मादर्बुदन्यर्बुदे अपि ॥ ४ ॥ वृन्दं खर्वनिखर्वाणि शङ्कुपद्माम्बुराशयः । ततः स्यान्मध्यमन्त्यं च परं चापरमप्यतः ॥ ५ ॥ परार्धं चेति विज्ञेयं दशवृद्धयोत्तरोत्तरम् ।¹ संख्या-स्थानानुसार मान इस प्रकार बताया है कि एक (1), दस (10), शत (100), सहस्र (1000), अयुत (10000), नियुत (100000), प्रयुत (1000000), अर्बुद (10000000), अन्यर्बुद (100000000), वृन्द (1000000000), खर्ब (10000000000), निखर्ब (100000000000), शङ्कु (1000000000000), पद्म (10000000000000) और इसके बाद अम्बुराशि (100000000000000) मध्य (1000000000000000), इसके उपरान्त अन्त्य (10000000000000000), पुनः पर (100000000000000000), अपर (1000000000000000000) तथा इसी प्रकार परार्ध (10000000000000000000) संज्ञक इन संख्याओं को उत्तरोत्तर दस- दस की वृद्धि से जानना चाहिए। अधोयोगे सङ्कलितास्तत् सङ्कलितमुच्यते ॥ ६ ॥ एक के नीचे एक संख्या रखते हुए उन्हें योग से सङ्कलित करने को सङ्कलित अर्थात् जोड़ कहते हैं।
- इस प्रकार से एक, दश, सौ, हजार, दस हजार, नियुत, प्रयुत, अर्बुद, अन्यर्बुद वृन्द, खर्व, निखर्व, शङ्कु, पद्म राशियाँ, संख्याएँ होती है। इनमें भी मध्यम, अन्त्य और परं और ऊपरं तथा उनसे परे भी परार्ध आदि तक इन संख्याओं को समझना जो एक एक से दस गुनी वृद्धि को प्राप्त होती है। उक्त श्लोक ज्यों के त्यों समराङ्गणसूत्रधार (9, 47-49) में आए हैं। अपराजित के इस अध्याय पर भास्कराचार्य कृत लीलावती का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। यही अध्याय सूत्रधार मण्डन कृत राजवल्लभ के 11वें अध्याय का मूल उत्स रहा है। नारदपुराण में यह क्रमवार गणना इस प्रकार आई है— एकं दश शतं चैव सहस्रायुतलक्षकम्॥ प्रयुतं कोटिसंज्ञां चार्वुदमब्जं च खर्वकम्। निखर्वं च महापद्मं शङ्कूर्जलाधिरेव च॥ अन्त्यं मध्यं परार्द्धं च संज्ञा दशगुणोत्तराः । (नारद, पूर्व. 54, 12-13)