अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४७ 233 समपञ्चशलाकाश्च मद्रभिश्चककोत्तमम् ?। स्वरे स्वामिकान्तारेषु ग्रहवेधविशोधनम् ॥ ३७॥ इसी प्रकार वेध दर्शन के लिए ग्रहों की स्थिति पञ्चशलाका और सप्तशलाका चक्रों से उत्तम प्रकार से देखी जा सकती है। स्वर (वर = चुनाव) में स्वामी और कान्तार (अपने एवं पराए एवं पति-पत्नी) क्षेत्र में ग्रह वेध विशोधन करना चाहिए। रविवेधे च वैधव्यं चन्द्रे भृत्यं न जीवति। कुजे प्रजाक्षयं विद्याद् वन्ध्या सोमसुते मता ॥ ३८ ॥ रवि वेध से वैधव्य, चन्द्र वेध से सेवक की मृत्यु, मङ्गल वेध से प्रजा को क्षति जानना और सोमसुत अर्थात बुध के वेध से वन्ध्यत्व सूचित होता है। प्रव्रज्या गुरुवेधे तु अपुत्रा शुक्रवेधतः । दुःखदा सूर्यपुत्रेण ग्रहवेधविशोधनम् ॥ ३९ ॥ गुरु का वेध होने से प्रव्रज्या करनी पड़ती है। शुक्र वेध से सन्तानहीनता होती है तथा शनि के वैध से निश्चय ही दुःख आता है। इस प्रकार से यहाँ यह ग्रहों का वेध विशोधन कहा गया। इति सूत्रसन्ताणगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां ज्योतिषलक्षणाधिकारो नाम षट्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४६ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ज्योतिष लक्षण अधिकार नामक छियालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥ गणितक्षेत्रनिर्णयो नाम सप्तचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४७ ॥ विश्वकर्मोवाच — उद्धृत्य गणितात्सारं सर्वशास्त्रादिदीपकम्। वेदाश्रः क्षेत्रवास्तुश्च वृत्तश्चाष्टाश्र एव च ॥ १ ॥ ज्ञेयो द्वात्रिंशदश्रश्च शिलायां विविधोत्तमः । षट्कोधश्च त्रिकोणश्च चन्द्रार्धो गोलकः परम् ॥ २॥ विश्वकर्मा बोले कि सभी शास्त्रों के दीपक-तुल्य माने जाने वाले गणितशास्त्र का सार उद्धृत करके चतुरश्रक्षेत्र वास्तु, वृत्तक्षेत्र वास्तु, अष्टाश्रक्षेत्र वास्तु, बतीसकोणीयक्षेत्र वास्तु को विविध प्रकार की उत्तम शिलाओं से षट्कोण, त्रिकोण, अर्धचन्द्राकार तथा गोलाकार तक कहूँगा।