अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४७ 235 अग्रेऽङ्काङ्क स्थापनीयस्तद्गुणैः पृष्ठपादतः । ऊर्ध्वमूर्ध्वं क्रमान्मूलं सङ्ख्या सङ्कलिता भवेत् ॥ 7 ॥ आगे-आगे अङ्कों की स्थापना करते हुए पीछे की संख्याओं के ऊपर से ऊपर की मूल से क्रमवार जोड़ते जाने से (या गुणा से) संख्या सङ्कलित होती है। एवं पादाश्च चत्वारो गणिताङ्कसमुच्यते । सङ्कलितं करणसूत्रामार्याद्वयंतैकोवृद्धिश्च ? । अधोयोगे सङ्कलीकृता तस्माद्देशोत्तरां च ? ॥ 8 ॥ इस प्रकार गणिताङ्क कहलाने वाले चार पाद होते है। सङ्कलित, करण सूत्र को, आर्याद्वय अन्त में एक की वृद्धि ? नीचे योग करे सङ्कलित करें, उसके भेदशः उत्तराच ? ।¹ अथ संख्यापद नामानि च - अग्रपृष्ठो अग्रकोत्तरा वा शून्यपृष्ठोक्त ? । भवेद् दशोत्तरा वृद्धी........ ? ॥ 9 ॥ एकराशिस्तु गणिते मूलं वर्गो द्विराशिकः । त्रिराशिकोऽथवोक्तश्च घनो वै कर्णसम्पुटे ॥ 10 ॥ आगे पीछे के आगे के बाद वा शून्य पृष्ठोवत्त ? । दशोत्तरा वृद्धि होती है ? एक ही संख्या से मूल संख्या को गणित करने से 'वर्ग द्विराशिक' बनता है। इसी तरह एक ही राशि को मूल से तीन बार गणित करने से घन संख्या बनती है, जो 'कर्ण सम्पुट' कहलाती है। पदद्वयं हते पादे पदैस्तद् गुणितं तथा। पदघ्नं च पदहतमित्यभिख्यं च राशिकम् ॥ 11 ॥ दो पाद को एक पाद से भाग देने पर जो संख्या आए, उसे पुनः पाद से गुणित करे तो उसे 'पदघ्न' तथा 'पदहत राशि' कहते हैं।
- यहाँ पाठ भ्रष्ट होने से नारदीय निर्देश को देखना चाहिए। यथास्थानीय अङ्कों का योग या अन्तर क्रम या व्युत्क्रम से करें। गुण्य के अन्तिम अङ्क को गुणक से गुणा करें। इसके बाद उसके पार्श्ववर्ती अङ्क को भी उसी गुणक से गुणा कर दें। इस प्रकार आदि से अङ्क तक गुणा करने पर गुणनफल लब्ध हो जाता है। इसी प्रकार भागफल जानने के लिए भी प्रयास करना चाहिए। जितने अङ्क से भाजन के साथ गुणा करनेपर भाज्य में से घट जाए, वही अङ्क लब्धि अर्थात् भागफल होता है। दो समान अङ्कों के गुणनफल को वर्ग कहा गया है। ज्ञानियों ने उसे ही कृति कहा है- क्रमादुत्क्रमतो वापि योगः कार्योत्तरं तथा॥ हन्याद्गुणेन गुण्यं स्यात्तेनैवोपान्तिमादिकान्। शुद्धेद्धरोयदगुणश्च भाज्यान्त्यातफलं मुने ॥ समाङ्कतोऽथो वर्गः स्यात्मेयाहुः कृतिं बुधः। अन्त्यात्तु विषमात्यक्त्वा कृतिं मूलं न्यसेत् पृथक् ॥ इत्यादि... (नारद. पूर्व 54, 14-16)