भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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236 अपराजितपृच्छा द्वाभ्यां तु द्विगुणीकृत्य मूलभागोद्भवं पदम्। एवं मूलाभिधानं च वास्तुविद्भिरुदाहृतम्॥ 12॥ दोनों को दुगुना करके मूल भाग से निष्पन्न पद को 'मूलाभिधान' नाम से वास्तुशास्त्री जानते हैं। एवं यद् द्विगुणीकृत्य चतु ? र्द्विगुणमेव च। प्रख्यातं द्विगुणं चेति प्रयुक्तं गणितादिके॥ 13॥ इस प्रकार जब दुगुने किए जाए चार को ? इस द्विगुण राशि को गुणित करने वाले विद्वान 'द्विगुण' (पहाड़े की तरह) नाम से जानते हैं। कर्मान्तर व्यवहारं क्षेत्रं चाऽपि प्रदापयेत्। दीर्घं हन्यात्पृथुत्वेन वेदाश्रस्य फलं भवेत्॥ 14॥ कार्य करते समय व्यवहार क्षेत्र में भी इसे प्रयोग में लाना करना चाहिए। लम्बाई को चौड़ाई से गुणा करके चतुर्भुज क्षेत्र का फल प्राप्त होता है। सूत्र इस प्रकार है— लम्बाई × चौड़ाई = क्षेत्रफल। खातमानं तु पाषाणे गोलपिण्डैस्तु ताडयेत्। तदसङ्ख्याता कर्माणं पाषाणस्य तदन्तरम् ?॥ 15॥ पाषाण को खात-मान से अर्थात् खान से निकालते समय गोलपिण्ड से चोट करनी चाहिए, इसके लिए संख्या अंकित कर ही कार्य में लेना चाहिए। नवत्यङ्गुलदैर्घ्ये च पृथुत्वे चतुर्विंशतिः। द्वादशाङ्गुलपिण्डं च शिलामानप्रमाणतः॥ 16॥ नब्बे अङ्गुल की लम्बाई और चौबीस अङ्गुल की चौड़ाई (मोटाई) से बारह अङ्गुल का पिण्ड शिलामान प्रमाण से कहा है। यच्छिलायाः समानं च गणित्वा क्रमयोगतः। तेषां गुणितसङ्ख्याश्च पाषाणाश्च क्रमोदिताः॥ 17॥ जिस शिला के समान ही क्रम योगानुसार गणित करके जो गुणित संख्या आए, उसे पाषाण की क्रमोदिता संख्या कहते हैं। दीर्घं द्वादशको भागः षड्भागश्चैव विस्तरः। पिण्डस्य तुर्यो भागश्च अन्योन्मपि ताडयेत्॥ 18॥ बारह भाग की लम्बाई और छह भाग की चौड़ाई से पिण्ड के चार भाग को एक दूसरे से ताड़न करें।