भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 284

सूत्र-४७ 237 दीर्घहस्तान् पृथुत्वेन पुनः पिण्डेन ताडयेत्। द्व्यष्टाशीतिशतैर्भागं लब्धिरङ्गुलसङ्ख्यिका ॥ १९ ॥ पृथुपिण्डे ताड्यमाने वृन्द्धिहाससमुद्भवे। शिलानां क्रमयोगे तु खातमानं तथोच्यते ॥ २० ॥ दीर्घस्थान बड़े गज की संख्या 24 की मोटाई पुनः 24 से ताड़न करने पर एक सौ बयासी (182) भाग को अङ्गुल संख्यिका कहते है। मोटाई पिण्डमान को ताड़न से वृद्धि और ह्रास बनता है, उसे शिलाओं के क्रमयोग से 'खात-मान' कहा जाता है। पिण्डाङ्गुलैर्दीर्घहस्ता गुणितव्याः प्रयत्नतः। पृथुह्रस्ववृद्ध्यार्धा च धत्ते मानं शिलादिकम् ॥ २१ ॥ इति शिलामानः। दीर्घहस्त-गज के 24 अङ्गुल पिण्ड से गुणित करके मोटाई के ह्रस्व, दैर्घ्य को आधा करने पर शिलादिक मान लब्ध होता है। वृत्तदीनां फलानयनं – व्यासे त्रिगुणे परिधिः षष्ठभागविमिश्रिते। व्यासार्धं च परिध्यर्धं गुणे वृत्तफलं भवेत् ॥ २२ ॥ व्यास की तिगुनी परिधि षष्ठांश युक्त होती है। व्यासार्ध और परिधि का अर्ध गुणा करने पर किसी भी वृत का क्षेत्रफल आता है। समस्ता वृत्तपरिधिर्गुणिता व्यासपादतः। हरेच्चतुर्विंशतिभिर्लब्धमङ्गुलतत्फलम् ॥ २३ ॥ समस्त वृत्त की परिधि को व्यास के चतुर्थांश से गुणित करके चौबीस अङ्गुल से भाग देने पर जो लब्धि आए उतने अङ्गुल उसका फल समझना चाहिए। व्यासे वर्गस्य ? गुणिते चतुर्थांशं तु पातयेत्। शेषेऽष्टादशके भागे क्षिप्ते वृत्तफलं भवेत् ॥ २४ ॥ व्यास को वर्ग गुणित करके चतुर्थांश घटा दे, फिर शेष के अठारह भाग करने पर वृत्तफल बनता है। व्यासवर्गहस्तैकोनपञ्चाङ्गुलानि पातयेत्। शेषं यल्लभ्यते तच्च वृत्तस्यापि फलं भवेत् ॥ २५ ॥ वर्ग हस्त 24 × 24 को व्यास से एक कम पञ्चाङ्गुली (चतुर्थांश) से भाग दे, जो शेष प्राप्त हो, वह वृत्त का फल होता है।