अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें238 अपराजितपृच्छा तस्यास्तु(स्नु)वौलेनहितं खातकूपफलं भवेत् । पाषाणपिण्डहतं वा शिलामानं तु सङ्ख्यया ॥ २६ ॥ उपर्युक्त विधि से कूप के खात परिणाम प्राप्त होता है। जो पाषाण पिण्डमान से भाग देने पर शिला मान की संख्या आती है। भूवदन समासार्धं च लम्बकेनात्र गुणितम् ? । कुद्दलं लम्बहतं च जायते क्षेत्रफलम् ॥ २७ ॥ भूवदन के समान ही आधा और ले और उसे लम्बक से गुणित करे (?) , तो कुद्दलं लम्बहत क्षेत्रफल आता है। तविवेधगुणितं च खातफलं प्रसिद्धयेत्। समविषमाधवेधैः पदैर्विषमवेधकैः ॥ २८ ॥ इस प्रकार से वेध के गुणित करके खातफल आता है। सम-विषम आध वेधों में पदों में विषम वेध कहा है। गोलव्यासवर्गगुणं ताड्यं व्यासार्धपिण्डकम् । द्विशताष्टाशीतिहृतं लब्धं गोलफलं भवेत् ॥ २९ ॥ गोल और व्यास के वर्ग को गुणित कर व्यासार्ध पिण्डक को भाग दें। उससे दो सौ अस्सी (280) निकाल लें तो गोलफल की लब्धि होती है ॥ २९ ॥ व्यासवर्गे तु गुणितं फलमेकं ? प्रकीर्तितम् । षड्भागं द्विरसं त्यक्त्वाऽष्टाश्रे क्षेत्रफलं भवेत् ॥ ३० ॥ इत्यष्टाश्रक्षेत्रम् । व्यास के वर्ग को गुणित करके एक फल कहा जाता है। इसके बारह (द्विरसं) के छह भाग को छोड़ने पर अष्टाश्र क्षेत्र का क्षेत्रफल आता है। षडंशमेकशेषं च त्यक्त्वा सूत्रापरः शिखा ? । दीर्घ पृथुत्वे गुणितं षडश्रे क्षेत्रजं फलम् ॥ ३१ ॥ इति षडश्रक्षेत्रम् । षडंश में एक शेष को अर्थात 1 ¹/⁶ छोड़कर सूत्र पर शिखा ? लम्बाई को मोटाई से गुणित करने से षडश्र क्षेत्रफल बनता है। वर्गमूलफलं त्यक्त्वा षड्भागं शक्रांशं त्यजेत् । शेषं फलं विजानीयात् क्षेत्रे वै षोडशाश्रके ॥ ३२ ॥ इति षोडशाश्रक्षेत्रम् ।