अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें246 अपराजितपृच्छा चतुर्विधपरीक्षणं — यथा चतुर्भिः कनकं शिष्यवच्च परीक्ष्यते । ताडनच्छेदतापैश्च घर्षणैः पुरुषस्तथा ॥ २ ॥ जिस तरह सोने को और शिष्य को चार प्रकार से परीक्षा करके देखा जाता है, यथा— ताड़न, छेदन, तपाना और घिसना, उसी प्रकार पुरुष की भी इन चार प्रकारों से परीक्षा करनी चाहिए। भृत्यलक्षणं — उद्यमः साहसं धैर्यं बलं बुद्धिः पराक्रमः । यस्मिन् भृत्ये चिह्नषट्कं तस्माद् देवोऽपि शङ्कते ॥ ३ ॥ जिस भृत्य में अर्थात कर्म कार्य में नियुक्त कर्मकर में उद्यम, साहस, धैर्य, बल, बुद्धि और पराक्रम— ये छह चिह्न पाए जाते हैं, उससे तो देवता भी भय खाते हैं अर्थात् आशङ्कित रहते हैं। पूर्वं परीक्षितो भृत्यस्तस्य द्रव्यं निवेदयेत् । स्वामिकार्यकरो नित्यमसाध्यं साधयेद् ध्रुवम् ॥ ४ ॥ पहले कर्मकर या भृत्य की ठीक परीक्षा कर लेनी चाहिए। उसमें यदि वह पूर्णतः सफल सिद्ध होता है, तो उसको उसका वेतन अवश्य बता देना चाहिए जो उसकी योग्यता के उपयुक्त हो क्योंकि समुचित एवं पुष्कल वेतन पाने वाले कर्मकर सदा स्वामीभक्त, स्वामी के कार्य को कुशलता से पूरा करने वाले, प्रत्येक अवसर पर उपलब्ध रहकर काम को सफल बनाने वाले, असाध्य कामों को भी अवश्य ही साधने वाले और निश्चयपूर्वक कर दिखाते हैं। सुशीलः सुगुणो भृत्यः सुकुलः सत्यताधिकः । सोद्यमो विनयैर्युक्तो विभवे निःस्पृहो ध्रुवः ॥ ५ ॥ परदारधनत्यागी प्रियालापी च देशजः । स्वामिकार्यकरो नित्यं त्रैलोक्यं तस्य शङ्करम् ॥ ६ ॥ जिस कर्मकर में सुशीलता, सुगुण, सुकुल, सत्यवादिता, उद्यमिता, विनय और वैभव में भी सरलता, निस्पृहता दृढ़ हो, वह पराई स्त्रियों, पराए धन का त्यागी एवं प्रियवाणी बोलने वाला होता है। मुख्य बात यह कि वह उसी क्षेत्र का निवासी अर्थात् देशज हो जो क्षेत्र की पूरी जानकारी रखता है। वह स्वामी का कार्य सदा सफल करके दिखाता है और तीनों लोकों में शान्तिकारक होता है।