अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 294, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४९ 247 सुभृत्यः सुगुणैर्युक्तः शीलवांश्च विवेकवान्। क्रमजातकुले जातो महासत्यप्रियंवदः ॥ 7 ॥ अच्छा कर्मकर या भृत्य, सुगुणों से युक्त हो, शीलवान, विवेकवान, उत्तम कुल में जन्मा हो, महा सत्यवादी और मधुरवाणी में बोलता हो। संयमैर्नियमैर्युक्तस्त्रीभावे निःस्पृहो ध्रुवम्। स्वामिकार्यकरो नित्यं त्रैलोक्यं तस्य गोचरम्॥ 8 ॥ वह संयम, नियम से रहता है और स्त्री जाति के प्रति सदा दृढ़ता पूर्वक निस्पृही हो, वह एक ऐसा स्वामी का कार्य करने वाला व्यक्ति होता है जिसे तीनों ही लोकों के बारे में सही, सूझबूझ वाली दृष्टि हो। प्रारब्धं तु भवेद् यावत्तावद् वन्द्येषु भावना। तादृशं कारयेद्भावं खलु देवेषु यादृशम्॥ 9 ॥ प्रारब्ध तो तभी तक काम करता है जब तक कि आपकी भावना वन्दनीय लोगों के प्रति भक्ति और प्रेमपूर्वक है। यह नियम ही समझो, आप जिस तरह की भावना देवताओं के प्रति रखेंगे, उसी तरह वे भी आप पर भी अनुकम्पा करते हैं।¹ देवपादे स्वरूपेण पूर्णभावे सदास्थितः। अर्थसामर्थ्यदानेन स्वामिपुण्यं तु धार्यते ॥ 10 ॥ जो देवता के चरणों में और स्वरूप में पूर्णश्रद्धा भाव से हमेशा स्थिता रहता है और अपने सामर्थ्यानुसार अर्थ का दान करके वह स्वामी के पुण्यों को धारण करने का अधिकारी हो जाता है। सुदानेषु रतो नित्यं सुभृत्यः प्रभुकाम्ययोः ?। स्वामी सुहृत्संयोगे तु जल्पे किंकरतां व्रजेत् ॥ 11 ॥ जो सुभृत्य, कर्मकर नित्य सुदान में लगा रहता है और अपनी स्वामी की सेवा पूरी करता है, तो इससे स्वामी-सेवक को आपसी प्रेम संयोग शीघ्र ही हो जाता है। वह कर्मकर, सेवक अपने स्वामी के साथ बातचीत करने में सदा नम्रता, आदरयुक्त व्यवहार करता है। स्वयं धराधिपो वत्स बहुकर्मसु संस्थितः। नित्यं सन्मानोद्यमनधर्मकर्मादिकारकः ॥ 12 ॥
- श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो मुझे जिस भाव से भजता है, मैं भी उसे उसी भाव से भजता हूँ— ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥ (गीता 9, 29)