अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें248 अपराजितपृच्छा स्वयं क्षेत्र का स्वामी तो हे वत्स ! बहुत से कार्यों में व्यस्त रहता है, अतः उसे नित्य धर्म, कर्मादि करने वाले कर्मकारों का सम्मान का उद्यम करते रहना चाहिए। दातव्यं वस्त्रताम्बूले खाद्यं पानं दिने दिने। सन्मानं जन्मतो दद्यात् प्रियालापैः सुनित्यशः ॥ 13 ॥ उनको वस्त्र, ताम्बूल, खाद्य वस्तुओं और पान योग्य पेय पदार्थ प्रतिदिन देते रहकर खुश रखना चाहिए। (व्यवहार के रूप में) किसी जन्म से कुलीन व्यक्ति को सम्मान देकर, किसी से मधुरवाणी में बात करके तो किमी किमी के कार्य की प्रशंसा करके सदा प्रसन्न रखना चाहिए। इत्यमनन्तर सुभाषितानि - असहाये कुतः सिद्धिर्धनहीनः पराजितः। पुष्कलं साधनं यस्य सिद्धिस्तस्य करे स्थिता ॥ 14 ॥ क्योंकि, यह नियम है कि सहायकों के अभाव में सिद्धि कैसे मिल सकती है और धन के अभाव में व्यक्ति सदा पराजित होता रहता है। इसलिए जिसके सहायक और धन का पुष्कल साधन है, सिद्धि भी उसके ही हाथ में आती है। बहुवित्तचयो वत्स बुद्धिसोद्यमसाहसैः । सूत्रमन्त्रं सुभृत्यैश्च स्यात्सदा च सुखी नृपः ॥ 15 ॥ इसलिए हे वत्स ! अपार धन का संग्रह करो और इसी में अपनी बुद्धि और साहस को उद्यमपूर्वक लगाओ जिससे शिल्पशास्त्र के सभी सूत्र, मन्त्रादि और अच्छे कर्मकर, भृत्य सदा ही उपलब्ध होते रहे, जिससे राजा भी सुखी रहे और कर्मकर भी सुखी रहे। सर्वकार्येषु निबन्धं त्रिकालज्ञः सदा भवेत्। वर्तमानं तथातीतं भाव्यं नित्यं विलोकयेत् ॥ 16 ॥ सभी कार्यों पर पूरा प्रबन्ध बनाए रखना चाहिए, सदा ही व्यक्ति को त्रिकालज्ञ या भूत-भविष्य-वर्तमान का ज्ञानवान होना चाहिए ताकि वर्तमान को अतीत की तुलना में देखते हुए भविष्य की पूरी तैयारी हो सके। प्रारम्भे सर्वकार्याणां सर्वोपकरणैर्युतः। आदिमध्यान्ततः पृष्टा कृत्यान्तं कारयेद् बुधः ॥ 17 ॥ समझदार व्यक्ति सदा सभी कार्यों के प्रारम्भ करने के समय सभी प्रकार के उपकरणों का संग्रह कर लें जिससे कार्य को आदि से लेकर मध्य और अन्त तक पहुँचाकर कृत-कृत्य हो सके।