अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
248 अपराजितपृच्छा स्वयं क्षेत्र का स्वामी तो हे वत्स ! बहुत से कार्यों में व्यस्त रहता है, अतः उसे नित्य धर्म, कर्मादि करने वाले कर्मकारों का सम्मान का उद्यम करते रहना चाहिए। दातव्यं वस्त्रताम्बूले खाद्यं पानं दिने दिने। सन्मानं जन्मतो दद्यात् प्रियालापैः सुनित्यशः ॥ 13 ॥ उनको वस्त्र, ताम्बूल, खाद्य वस्तुओं और पान योग्य पेय पदार्थ प्रतिदिन देते रहकर खुश रखना चाहिए। (व्यवहार के रूप में) किसी जन्म से कुलीन व्यक्ति को सम्मान देकर, किसी से मधुरवाणी में बात करके तो किमी किमी के कार्य की प्रशंसा करके सदा प्रसन्न रखना चाहिए। इत्यमनन्तर सुभाषितानि - असहाये कुतः सिद्धिर्धनहीनः पराजितः। पुष्कलं साधनं यस्य सिद्धिस्तस्य करे स्थिता ॥ 14 ॥ क्योंकि, यह नियम है कि सहायकों के अभाव में सिद्धि कैसे मिल सकती है और धन के अभाव में व्यक्ति सदा पराजित होता रहता है। इसलिए जिसके सहायक और धन का पुष्कल साधन है, सिद्धि भी उसके ही हाथ में आती है। बहुवित्तचयो वत्स बुद्धिसोद्यमसाहसैः । सूत्रमन्त्रं सुभृत्यैश्च स्यात्सदा च सुखी नृपः ॥ 15 ॥ इसलिए हे वत्स ! अपार धन का संग्रह करो और इसी में अपनी बुद्धि और साहस को उद्यमपूर्वक लगाओ जिससे शिल्पशास्त्र के सभी सूत्र, मन्त्रादि और अच्छे कर्मकर, भृत्य सदा ही उपलब्ध होते रहे, जिससे राजा भी सुखी रहे और कर्मकर भी सुखी रहे। सर्वकार्येषु निबन्धं त्रिकालज्ञः सदा भवेत्। वर्तमानं तथातीतं भाव्यं नित्यं विलोकयेत् ॥ 16 ॥ सभी कार्यों पर पूरा प्रबन्ध बनाए रखना चाहिए, सदा ही व्यक्ति को त्रिकालज्ञ या भूत-भविष्य-वर्तमान का ज्ञानवान होना चाहिए ताकि वर्तमान को अतीत की तुलना में देखते हुए भविष्य की पूरी तैयारी हो सके। प्रारम्भे सर्वकार्याणां सर्वोपकरणैर्युतः। आदिमध्यान्ततः पृष्टा कृत्यान्तं कारयेद् बुधः ॥ 17 ॥ समझदार व्यक्ति सदा सभी कार्यों के प्रारम्भ करने के समय सभी प्रकार के उपकरणों का संग्रह कर लें जिससे कार्य को आदि से लेकर मध्य और अन्त तक पहुँचाकर कृत-कृत्य हो सके।
सूत्र-५० 249 बुद्धिकामी भवेन्नित्यं सर्वत्रैवापराजित। व्यवहारे निर्मला ये ते भृत्या वसुधाधिपाः ॥ १८ ॥ हे अपराजित ! सर्वत्र जो व्यक्ति बुद्धि का सदा प्रयोग करता रहे और अपना व्यवहार निर्मल रखे, वे ही अपने सेवक और वसुधा के स्वामी कहे जा सकते हैं। अर्थेन वर्धते चार्थ सन्मानैर्वन्दिता भया ? । व्यवहारे वर्धते लोकश्चतुरङ्गः प्रियागमः ॥ १९ ॥ यह तो एक ध्रुव सत्य है कि अर्थ से ही अर्थ की वृद्धि होती है और सम्मान से और वन्दन से निर्भयता बढ़ती है। इसी तरह सद्व्यवहार से परस्पर प्रेम और निर्मलता बढ़ती है और लोक के चारों अङ्ग— धर्म, अर्थ, काम, मोक्षादि तथा प्रियजनों का आगमन बना रहता है। तेषां सुसिद्ध्यति सर्वमसाध्यं साध्यं नित्यशः। दानसन्मानमात्रेण देवोऽपि च सन्मानयेत् ॥ २० ॥ ऐसे ही मनुष्यों के सब साध्य और असाध्य काम नित्य साध्य होते रहते हैं क्योंकि दान और सम्मान मात्र ही देवताओं का भी सम्मान हो जाता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सूत्रधारपरीक्षाधिकारो नामैकोनपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ४९ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सूत्रधार परीक्षा अधिकार नामक उनचासवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥ सूत्रधारलक्षणात्मकं पञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५० ॥ विश्वकर्मावाच — शृणु वत्स यथान्यायं सूत्रधारस्य लक्षणम्। शास्त्रज्ञः कुशलो दक्षो वास्तुविद्याविबोधकः ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने कहा— हे वत्स ! न्यायतः सूत्रधार के जो लक्षण होते हैं उन्हें सुनो ! सूत्रधार शास्त्रज्ञ हो, कुशल हो, दक्ष हो और वास्तुविद्या को समझने-समझाने वाला होना चाहिए। सूत्रधारो महाप्राज्ञः षट्कर्मसु निरन्तरम्। यो नित्यं त्यमरतत्त्वं ¹सादृष्टोऽपि महालयम् ॥ २ ॥
- 'सामृष्टोऽपि तधालयम् ?' इति प्रकाशित पाठः।
250 अपराजितपृच्छा सूत्रधार महाप्राज्ञ होना चाहिए। वह निरन्तर षट्कर्म में संलग्न रहकर नित्य आत्मतत्त्व को अपने हृदय मन्दिर में अमरसत्त्व के रूप में दर्शन करता रहे। माधुर्यवांस्तथालापे वास्तुविद्यादिकौशलः। ज्ञानचक्षुः सुहृदयः प्रारम्भादिरुजापहः ॥ ३ ॥ उसका वार्तालाप माधुर्यतायुक्त हो, वह वास्तुविद्यादि शास्त्रकर्म में कुशल हो, उसमें ज्ञानचक्षु की अन्तःचेतना दृष्टि की सूझ-बूझ हो, वह सरल हृदय हो और प्रारम्भ से ही निरोगी स्वस्थ देह वाला हो। हस्तलाघवसम्पन्नो घाट्यचित्रादिकौशलः। चक्षुः प्रत्यक्षकृच्चैव ह्यदृष्टं ज्योतिषो यथा ॥ ४ ॥ सूत्रधार में अपनी हस्तकला में अनन्य कुशलता ऐसी हो कि वह अपने हाथ से घड़ी गई मूर्ति अथवा चित्रकला से ऐसा प्रभाव उत्पन्न कर दें कि उन्हें देखने वाला - मानो उन वस्तुओं को नहीं वरन उनमें प्रतिबिम्बित रूपों को साकार प्रत्यक्ष देख रहा हो, जिसका प्रकाश उसके हृदय में भी ज्योतिस्वरूप में प्रकट हो रहा है। ग्रन्थार्थगुणसंयुक्तो वास्तुमर्मादिबोधकः। आत्ममत्युद्भवं रूपं ससूत्रं स च कर्मणा ॥ ५ ॥ सूत्रधार की प्रमुख विशेषता यह होनी चाहिए कि वह शिल्प-वास्तुग्रन्थों के ठीक-ठीक अर्थ को समझने के गुण से सम्पन्न हो तथा वास्तु में जो भी मर्म-दोष होते है, उनको बता सकने में समर्थ हो, इस तरह से वह अपने आत्मोद्भव ज्ञान को स्वरूप देकर उसे अपनी कार्य कुशलता से ससूत्र, सटीक सिद्ध कर सके। सूत्रधारोपयोगार्थं¹ वास्तुशास्त्रादिबोधनम्। भुवनकोशविज्ञानं प्रमाणं सूत्रकर्मणि ॥ ६ ॥ वास्तुशास्त्रादि को समझने व समझाने के लिए सूत्रधारों के उपयोगार्थ अनेकों ग्रन्थ-विषय हैं यथा— भुवनकोश विज्ञान, प्रमाणसूत्रकर्मणि ² समुद्रोपकण्ठदेशमहाशैलाश्रमादिकम्। भूमिभागैरनेकैश्र्च परीक्षा सूत्रकर्मणाम् ॥ ७ ॥
- 'सूत्रधारोपचारार्थ ?' इति प्रकाशित पाठः।
- इस श्लोक से ग्रन्थकार वास्तु के जिन ग्रन्थों के विषयों, नामों का उल्लेख करता है, ऐसा लगता है कि वह समराङ्गणसूत्रधार की ओर सङ्केत कर रहा है क्योंकि वास्तुशास्त्रबोधन के बाद भुवनकोश, सूत्रकर्म के प्रमाणादि विषयों से ही समराङ्गणसूत्रधार का आरम्भ होता है। आगे के विषय भी समराङ्गणसूत्रधार के अनुसार ही है। वैसे भी अपराजितपृच्छा पर समरांगणसूत्रधार का पर्याप्त प्रभाव विद्यमान है।
सूत्र-५०. 251 मर्मोपमर्मवेधाश्च वंशोपवंशकानि च। सन्धिरेखाषट्कशूलं लाङ्गलं पञ्चकादिकम् ॥ 8 ॥ समुद्रोपकण्ठ प्रदेश, महाशैल, आश्रमादि भूमिभाग अनेक प्रकार के हैं जिनकी परीक्षा हेतु सूत्रकर्म के ग्रन्थ-विषय है। इसी प्रकार मर्म और उपमर्म, वेध जानने के ग्रन्थ, वंश एवं उपवंश जानने के ग्रन्थ-विषय, सन्धि, रेखादि षट्कशूल (छह प्रकार के शूल), लाङ्गल या हलकादि यन्त्रों का ज्ञान और पञ्चकादि जानने के साधन तन्त्र मूलक ग्रन्थ-विषय हैं। षण्मर्मवेधा विज्ञेया वास्तुदेहसमुद्भवाः । निघण्टुं देवतानां च जानीयात् सूत्रकर्मणि ॥ 9 ॥ वास्तुदेह भवनादि में होने वाले छह मर्मवेध वास्तुशास्त्रों में बताए गए हैं तथा वास्तुपदीय देवताओं के बारे में जानने के लिए निघण्टु (शब्दकोष) बने हैं जिनकी जानकारी सूत्रकर्म करने वाले सूत्रधार को होनी ही चाहिए। नगरग्रामखेटाद्यं वास्तुवेदसमुद्भवम्। कूटखर्वटकूप्यादि ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 10 ॥ सूत्रधार को इन वास्तुवेद से निर्मित नगर, खेट, ग्राम, कूट, खर्वट, कूपादि की भी पूरी जानकारी होनी चाहिए। पुर-प्राकार-परिखा-प्रतोली-मार्ग-गोपुरम्। गृहं च राजवेश्माद्यं ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 11 ॥ पुर, प्राकार (नगरकोट), परिक्खा (नगर कोट के बाहर की खाई), प्रतोली (नगर की पोल), राजमार्ग, गोपुर (दरवाजे), गृह, भवन, राजप्रासाद (राजमहल) को भी जानकारी सूत्रधार के लिए आवश्यक होती है ॥ 11 ॥ प्रासादप्रतिमालिङ्गजगतीपीठमण्डपम् । वेदीकुण्डं स्रुचा चैव ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 12 ॥ सूत्रकर्मी या सूत्रधार को प्रासाद, मन्दिर आदि, प्रतिमा, लिङ्ग, जगती, पीठ, मण्डप, वेदी, कुण्ड, स्रुचा (हवनार्थ स्रुवा) आदि का भी पूरा ज्ञान होना चाहिए। प्रासादा विविधाकारा वैराज्यकुलसम्भवाः । विभक्त्यूर्ध्वतलच्छन्दं ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 13 ॥ रेखानां विविधाकारा प्रासादशिखरोत्तमाः । घण्टाकलशध्वजाद्यं ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 14 ॥ मन्दिर, प्रासाद विविध आकारों के होते है, जो वैराज्यादि जाति कुलों में वर्णित
252 अपराजितपृच्छा है, उन सब प्रासादों के समस्त विभाग, उसके ऊर्ध्वरूप और तलछन्द (आधुनिक एलिवेशन प्लान्) को भी सूत्रधार को ठीक तरह से जानने चाहिएं। प्रासादों के शिखरों की विविध आकारों की रेखाएँ बनती हैं, उनकी जानकारी तथा घण्टा, कलश, ध्वजा आदि की भी पूर्ण जानकारी सूत्रधार को होनी चाहिए। द्वारशाखाविधिं ज्ञात्वा मूलप्रासादच्छन्दजम्। द्वारपालविधिश्चैव ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 15 ॥ इस तरह मूल प्रासाद के छन्द के अनुरूप ही प्रासाद की द्वार और द्वारशाखा निर्माण की विधि तथा द्वारों पर द्वारपाल की मूर्तियों के निर्माण की विधि भी सूत्रधार को अवश्य जाननी चाहिए। द्वारदृष्टिपदस्थानं तथाग्रे वाहनादिकम्। दृष्टिस्थानं चान्तरं तु ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 16 ॥ प्रासाद में पूज्य मूर्ति की दृष्टि द्वार के किस-किस भाग तक की प्रशस्त मानी जाती है तथा प्रधान मूर्ति के वाहन को मूर्ति के आगे कहाँ स्थापित किया जाए, उनमें दृष्टि स्थान का कितना अन्तर होना चाहिए, ये सब बातें भी सूत्रधार को अवश्य जानना चाहिए। लक्षणं च द्वास्रविधिं शिवलिङ्गेषु सर्वतः। मानोन्मानप्रमाणं च ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 17 ॥ एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है कि शिवलिङ्गों में सर्वत्र सभी जगह सब प्रकार से जो-जो लक्षण बताए गए हैं और उनके प्रासादों के भी द्वारों की जो-जो विधियाँ बताई गई हैं, उन सबका मान, उन्मान अर्थात् सही माप लम्बाई, ऊँचाई, चौड़ाई आदि प्रमाणों की जानकारी सूत्रधार के लिए परम आवश्यक है। वितानानि विचित्राणि क्षिप्तान्युत्क्षिप्तकानि च। मन्दारसभापद्मानि ज्ञायन्ते सूत्रकर्मणा ॥ 18 ॥ प्रायः प्रासादों, मन्दिरों में तरह-तरह के वितानों भी छतों की रचना कही गई हैं जिसमें कई विचित्र प्रकार की है, जैसे कोई क्षिप्त और अनुक्षिप्त अर्थात् बाहर की ओर उभरी हुई और भीतर की ओर दबी हुई आकृति अलङ्करणों से युक्त बनती है। उनमें सभा मण्डप की वितानों, छतों में ही मन्दार, कहीं पद्म आदि अलङ्करणों की रचना भी होती है, इनकी जानकारी भी सूत्रकर्म करने वाले सूत्रधार को अवश्य होनी चाहिए। वितानानां संवरणा घण्टाकूटसमाकुलाः। सिंहसङ्घटनाकीर्णा ज्ञायन्ते सूत्रकर्मणा ॥ 19 ॥
सूत्रधार को इन वितानों के ऊपरी भाग में निर्माण के काम जैसे संवरणा, घण्टा, कूट के समाकुलों की रचना, सिंहों की सङ्घटना के समूहों आदि की भी जानकारी होनी चाहिए। शुक्लाम्बरधरः सूत्र स्वस्थचित्तः समाहितः । पूजापरिग्रहं दद्यादात्मचिन्ता तु दैवते ॥ २० ॥ इसके अलावा स्वयं सूत्रधार की वेशभूषा, स्वभाव में भी कई विशेषताएँ होनी चाहिए, यथा— वह स्वच्छ श्वेत वस्त्रधारी हो, स्वस्थचित्त हो, समाहित हो, निर्लेप हो, पूजा और परिग्रह मूर्ति में आत्मचिन्तनपूर्वक देवता भक्ति हो। तुष्टिदानं ततो दद्यात्सर्वकर्मसु वै तथा। सुभृत्यांस्तोषयेत्तत्र कर्मकारापरैः सह ॥ २१ ॥ सभी कर्मों में सदा सन्तुष्टि प्रदान करता हो तथा अपने आधीन काम करने वाले समस्त कर्मकारी भृत्यों को सन्तोष और प्रेम से साथ लेकर चलता है। तोषितैः सर्वसूत्रैश्च गुरुतः क्षेममाप्नुयात् । निर्विघ्नं च भवेत्तत्र सर्वकामफलं भवेत् ॥ २२ ॥ क्योंकि, सभी सूत्रधारों, कर्मकरों के गुरु की भाँति अपने अनुग्रह में रखकर उनको सन्तुष्ट रखते हुए उनके क्षेम-कुशल का पूरा ध्यान रखने से सभी काम निर्विघ्न पूर्ण होते हैं और सभी कामनाएँ फलीभूत होती है। सिद्धिं विनायकं चादौ क्षेत्रपालांस्ततोऽर्चयेत् । पूजयेदुक्तविधिना योगिनीश्च कुमारिकाः ॥ २३ ॥ अस्तु, जब भी कोई वास्तुकर्म का समारम्भ हो तो सदा ध्यान रखे कि सबसे पहले सिद्धि-विनायक की पूजा-अर्चना करें। इसके बाद क्षेत्रपाल की पूजा-अर्चना करें और बाद में उसी विधि से योगिनी और कुमारिकाओं की भी पूजा-अर्चना करें। भूपरिग्रहणं प्रोक्तं शुभं धात्रीपरीक्षणम् । पूर्वं त्वेवं प्रवक्ष्यामि शृणु चैकाग्रमानसः ॥ २४ ॥ (हे अपराजित!) भू-परिग्रहण के लिए भी कहा है कि धरती की शुभ परीक्षा करके ही लेनी चाहिए जैसा पहले ही मैंने तुम्हें कहा, वही पुनः कहता हूँ जिसे एकाग्र मानस होकर सुनो। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सूत्रधारलक्षणाधिकारो नाम पञ्चाशं सूत्रम् ॥ 50 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सूत्रधार लक्षण अधिकार नामक पचासवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 50 ॥
254 भूपरीक्षाग्रहकीलकारोपणमेकपञ्चाशं सूत्रम् ॥ 51 ॥ विश्वकर्मोवाच - भूमेः परिग्रहं कृत्वा समावनिमित्तिक्रमैः । दिव्यानि वीक्ष्य भौमानि शुभान्यशुभकानि च ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि भूमि का परिग्रह करके निर्माणार्थ चयन करके सात प्रकार से भूमि परीक्षा क्रमानुसार करें। इस क्रम में पहले दिव्योत्पात, भौमोत्पात् आदि निमित्तों¹ का शुभाशुभ भी देख लेना चाहिए। शुभेषु प्रस्थिते सिद्धिर्विजयः स्यान्महोत्सवः । अशुभेषु निवर्तेत न गच्छेत् पदमग्रतः ॥ 2 ॥ शुभ निमित्त होने पर काम शुरू करने पर सिद्धि और विजय मिलती है तथा सदा महोत्सव होते रहते हैं परन्तु अशुभ निमित्तों में कोई काम नहीं करना चाहिए और एक पद भी आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। तन्मध्ये तथा थानं शकुनानि न लक्षयेत् । चेष्टायुक्तिसमाख्यातं तत्फलं शकुनोत्तमैः ॥ 3 ॥ उन निमित्तों के मध्य में तो उस थान अर्थात् स्थान का शकुन आदि का भी देखना उचित नहीं अस्तु, केवल चेष्टा युक्ति के रूप में प्रसिद्ध प्रयोग मात्र ही किए जाने चाहिए, इन्हीं को उत्तम शकुन और उनकी फलश्रुति के रूप में जानना चाहिए। आचार्यप्रशंसाह - आचार्यः सूत्रधारैश्च यजमानैश्च संयुतः । त्रयश्च साधकैश्चैव कर्मकारादिसंयुताः ॥ 4 ॥ आचार्य, सूत्रधार और यजमान अर्थात् गृहकर्ता के साथ-साथ कर्मकर या अन्य कार्य करने वाले आदि जन (वास्तुकार्य में) जुड़ते हैं। आचार्यश्च स्वयं ब्रह्मा शिल्पी चैव जनार्दनः । यजमानस्तु शक्रः स्यात् त्रिभिः कर्म प्रवर्तते ॥ 5 ॥ वास्तुकर्म में प्रमुख आचार्य स्वयं ब्रह्मा रूप है और शिल्पी जनार्दन विष्णुरूप है तथा यजमान स्वयं इन्द्र स्वरूप में होता है; इन तीनों के समन्वय से ही सभी कार्य आगे बढ़ते हैं।
- मत्स्यपुराण और विष्णुधर्मोत्तरपुराण सहित बृहत्संहिता आदि में इन उत्पातों का वर्णन आया है। अद्भुतसागर और कृत्यकल्पतरु का शान्तिककाण्ड इन उत्पातों की शान्तियों पर ही लिखे गए बृहत्संग्रह हैं।
256 अपराजितपृच्छा भूमि परीक्षा की एक अन्य विधि इस प्रकार है— उस खात, खड्डे को पानी से भरपूर भर दें और शिल्पी सौ कदम तक चलें। उतने समय में देखें कि यदि उसमें पानी घट कर आधा तक रह गया है तो उस भूमि को कनिष्ठ समझे, यदि पानी पूरा का पूरा भरा रहे तो समझे कि भूमि श्रेष्ठ, उत्तम है और यदि पानी पौन भाग तक ही उतर पाए तो उस भूमि को मध्यमा समझना चाहिए। अन्यदप्याह — पुण्योदकैर्भृतं खातमूर्ध्वं बाणं समुत्क्षिपेत्। भृते मही चोत्तमा स्यान्मध्यमाङ्गुलहीनतः ॥ 10 ॥ द्व्यङ्गुलोने कनिष्ठा स्यात् त्रिविधं भूमिलक्षणम्। अल्पोदकेऽतिहीना स्याद्वर्जयेदधमाधमम् ॥ 11 ॥ इसी तरह एक और विधि से भी भूमि परीक्षा की जाती है— इसमें खात अर्थात् खड्डे को पवित्र जल से पूरा भरकर तत्काल खात से ऊपर एक बाण छोड़े और बाण पुनः भूमि पर आकर गिरे, उतने समय में यदि खात में पानी पूरा का पूरा भरा पाया जाए तो समझें कि वह भूमि उत्तम है, यदि खात में भरा पानी उतने समय में एक अङ्गुल प्रमाण से घट जाय तो उस भूमि को मध्यमा समझे और यदि उतने समय में ही खात का भरा पानी दो अङ्गुल प्रमाण से घट जाए तो उस भूमि को कनिष्ठा समझें। इस तरह ये तीन अन्य प्रकार से भी भूमि परीक्षा के कहे हैं और यह भी देखें कि उस खात में पानी यदि बहुत थोड़ा रह जाए उतने ही समय में तो उस भूमि को अति हीना समझें, ऐसी भूमि को अधमाधम समझकर पूरी तरह त्याग देनी चाहिए। ततः सम्पूरयेद्वत्स सुदिने सम्प्रधार्यते। परीक्षयेच्च भूम्याद्यं वर्णगन्धैश्च स्वादतः ॥ 12 ॥ इसके उपरान्त, हे वत्स ! अच्छा दिन देखकर उस खड्डे को वापस भर दें, खुला न छोड़ें और भूमि की वर्ण, गन्ध और स्वाद से भी तीन प्रकार की परीक्षा करें।¹ अथ प्लवानुसारेण गुणदोषादीनां — भूमीनामष्टप्लवादि गुणदोषान् ब्रवीमि ते। पूर्वप्लवा धरा श्रेष्ठा ह्यायुः श्रीबलवर्द्धिनी ॥ 13 ॥
- इसके बाद का वर्णन श्लोक 49 के बाद प्राप्त होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसके बीच के श्लोक प्रक्षिप्त हैं, अथवा कोई सूत्र बीच में जोड़ा गया है क्योंकि 49वें श्लोक के बाद पुनः श्लोक 1 से गणना आरम्भ हो जाती है। वैसे इस सूत्र के नामकरण में भी इस विषय का उल्लेख नहीं है। किन्तु, 'न' मातृका में भी आगे श्लोकों के क्रम में अन्तर नहीं है।
सूत्र-५१ 257 हे वत्स ! अब मैं तुम्हें भूमि के आठ प्रकार के प्लव के गुण-दोष के बारे में कहता हूँ। पूर्व प्लवा भूमि अर्थात् पूर्व की ओर ढलान वाली भूमि श्रेष्ठ होती है, उसे आयु, श्री-सम्पत्ति और बल को बढ़ाने वाली समझें। सर्वसम्पत्करी पुंसां प्रासादानां विभूतिदा। राज्यपूज्या सदानन्दा प्राक्प्लवाचेद्भवेन्मही ॥ 14 ॥ इसी प्रकार लोगों के लिए सभी सम्पत्तियों को दिलाने वाली और प्रासादों, मन्दिरों के निर्माण में भी विभूति या महिमा को बढ़ाने वाली, राजाओं द्वारा पूज्या, सदा आनन्द प्रदान करने वाली कही गई है। इस तरह पूर्व दिशा के प्लव वाली भूमि के गुण बताए गए हैं। आग्नेयप्लवभूमिफलमाह - आग्नेयप्लवका भूमिरग्निदाहभयावहा। शत्रुसन्तापदा नित्यं कलिदोऽग्निप्लवः स्मृतः ॥ 15 ॥ परन्तु, जो भूमि आग्नेय कोण की ओर ढलान वाली होती है, वहाँ अग्निदाह का भय रहता है, वहाँ शत्रुओं से सन्ताप मिलता रहता है। आग्नेय प्लव वाली भूमि नित्य ही कलह कराने वाली बताई गई है। दक्षिणप्लवाफलं - नश्यन्ति पुरुषास्तत्र देवता च प्रणश्यति। धनहानिकरो नित्यं रोगकृद् दक्षिणः प्लवः ॥ 16 ॥ अब दक्षिण में प्लव या ढलान वाली भूमि को लें, ऐसी भूमि पर देवता और पुरुष नाश को प्राप्त होते हैं और उन्हें प्राणों का भय बना रहता है। वह नित्य रोग बढ़ाने वाली और धन की हानि कराने वाली होती है। नैर्ऋतिप्लवाफलं - प्रवर्तयेद् गृहे पुंसां रोगांश्च मृत्युदायकान्। धनहानिं तथा नित्यं कुरुते नैर्ऋतिप्लवा ॥ 17 ॥ इसी तरह नैर्ऋति दिशा में ढलान वाली भूमि भी वहाँ बनने वाले घरों में रहने वाले लोगों में रोगों को बढ़ाने वाली तथा मृत्युदायक कष्टों से भरी तथा नित्य धन हानि कराने वाली होती है। पराप्लवाफलं - पश्चिमप्लवका भूमिर्धनधान्यविनाशिनी।
258 अपराजितपृच्छा शोकदाहं कुलं तत्र यत्र भूः पश्चिमप्लवा ॥ 18 ॥ अब पश्चिमी दिशा में ढलान वाली भूमि को देखें जो धन-धान्य का विनाश करने वाली होती है। ऐसी भूमि में शोक, दाह आदि गृहकर्ता के कुल में बने ही रहते हैं जो पश्चिम की ओर प्लव वाली होती है। वायव्यप्लवाफलमाह — शत्रुकर्त्री विरागा च गोत्रक्षयकरी तथा। गृहे च कन्यकाहन्त्री सदा दुःखभयावहा ॥ 19 ॥ अब वायव्य कोण की ओर ढलान वाली भूमि के दोषों को देखें। ऐसी भूमि शत्रुओं को बढ़ाने, वाली वैराग्य बढ़ाने वाली, गोत्र के परिजनों का क्षय करने वाली और ऐसे घरों में रहने वालों की कन्याओं को हनन करने वाली तथा सदा दुःख और भय देने वाली होती है। भुक्तं न जीर्यते तस्य मह्यां तत्र तु यो वसेत्। एतान् दोषानवहति दोषदा वायुदिक्प्लवा ॥ 20 ॥ इस भूमि पर जो भी बसता है, उसका खाया-पीया कभी नहीं पचता। इतने दोष इस वायव्य की ओर ढलान वाली भूमि के कहे हैं। उत्तरप्लवाभूफलं — पूज्या लाभकरी नित्यं पुत्रपौत्रविवर्धिनी। कामदा भोगदा चैव धनदा चोत्तरप्लवा ॥ 21 ॥ इन सबके विपरीत देखें कि उत्तर में प्लव या ढलान वाली भूमि कितनी शुभ होती है। ऐसी भूमि पूज्या होती है, नित्य लाभकारी होती है। वहाँ रहने वालों के परिवार में पुत्र-पौत्रों की वृद्धि होती है। यह भूमि सब कामनाओं को पूर्ण करने वाली होती है और इसमें सभी प्रकार के भोग उपलब्ध होते रहते हैं। ईशानप्लवाभूफलं — नरसौख्यसतीसत्यसौभाग्यादिविवर्द्धिनी। धनार्थैश्वर्यसम्पन्ना धर्मदेशानकप्लवा ॥ 22 ॥ इसी प्रकार ईशान कोण की दिशा में ढलान वाली भूमि भी बहुत ही शुभ मानी गई है। यह भूमि अपने यहाँ रहने वाले लोगों में सुख, सत्, सत्य और सौभाग्य बढ़ाने वाली होती है। इसमें धन, अर्थ, ऐश्वर्यों से सम्पन्नता प्रदान करने वाली, धर्म भावना बढ़ाने वाली सभी प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं।
सूत्र-५१ 259 पुनरपि प्राक्प्लवभूमिप्रशंसामाह — सा विद्या धनसम्पन्ना सर्वलोकहितावहा। विनयाचारसम्पन्नपुत्रपौत्रादिसङ्कुला ॥ २३॥ परन्तु, इन सब में पूर्व दिशा की ओर प्लव, ढलान वाली भूमि तो बड़ी ही शोभना कही गई है क्योंकि इस भूमि में रहने वालों को धन-सम्पन्नता, सर्व लोकहितकारी भावना, विनयपूर्वक आचार की भावना, पुत्र-पौत्रादि की बहुलता होती है। नीरोगा दानशीला च विशिष्टजनसेविता। पूर्वप्लवा तु या भूमिः शोभना सा प्रकीर्तिता ॥ २४॥ यहां के निवासी सदा निरोग, दानशील और सम्माननीय, विशिष्ट जनों की सेवा करने वाले होते हैं। गृहप्रासादोचितभूमिलक्षणं — गृहप्रासादयोर्भूम्याः कथ्यतेऽनुक्रमोऽधुना। मध्यप्लवा निकृष्टा स्यात् कनिष्ठा मध्यवर्तका ॥ २५॥ सर्वनाशकरी पुंसां सा भूमिस्तु निवासिनाम्। वर्जयेद्द्विद्रुमां क्ष्मां तु करालां मस्तकोन्नताम् ॥ २६॥ अब गृह और प्रासादों अर्थात् राजमहलों, देवालयों आदि के लिए जो भूमि काम में ली जाती है, उनके बारे में क्रमपूर्वक कहने जा रहा हूँ। ध्यान रहे कि जो भूमि मध्य प्लवा है अर्थात् जो स्वयं खड्डे में है और चारों ओर का पानी उसमें आकर एकत्र होता है, वह भूमि कार्य या आवास के लिए निकृष्ट अर्थात् बिल्कुल गई बीती और व्यर्थ होती है। ऐसी 'मध्यवर्तका' भूमि कनिष्ठा कहलाती है जो वहाँ के लोगों के लिए और निवासियों के लिए सर्वनाशकारी होती है। इसी तरह यह भी ध्यान रखने की बात है कि जो भूमि पेड़ों से रहित हो अर्थात् उजाड़ हो और बड़ी कराल, कठोर ऊँचाई से युक्त हो अर्थात् जिसका मस्तक भाग बीच में उन्नत हो, ऐसी भूमि भी वर्जित कही गई है। चौरेभ्यो भयदा नित्यं द्रव्यनाशकरी स्मृता। उच्छिन्ना च देवभूमी ¹ऊर्ध्वचा अधोगन्तव्यहीनः ॥ २७॥ क्योंकि, ऐसी भूमि पर चौरों का भय बना रहता है और इसके रखरखाव में भी
- 'ऊर्ध्वसार्धस्यतव्यही?' इति प्रकाशितपाठः।
260 अपराजितपृच्छा बहुत द्रव्य का नाश होता है। ऐसी उच्छिन्ना भूमि (ऊँची भूमि) या ऊँची देवभूमि ऊपर चढ़ने और पुनः उससे नीचे उतरने योग्य नहीं होती है। अजोष्ट्रखरसंसेव्यां वर्जयेत्तादृशीं महीम्। सशल्या बहुभक्ता च ह्यषूरा शोककारिका ॥ 28 ॥ जिस भूमि में अज-बकरी, ऊँट और गधे विचरण करते हों, जो भूमि शल्ययुक्त (हड्डियों वाली) हो, कण्टीली हो, जगह-जगह कटी-फटी और ऊसर भूमि हो, वे सब शोककारक होती हैं। अस्तु, ऐसी सभी भूमियाँ गृह के लिए वर्जनीय कही गई है। त्रिविधा स्फुटिता मृद्धी वृष्टिशुष्का रिक्ताङ्गिका। कप्पिलः¹ भ्रमगम्भीरा घटिका त्र्यक्षसिद्धिदा ॥ 29 ॥ जो भूमि वर्षाजल रिक्त हो जाने पर, कीचड़-मिट्टी के सूख जाने से तीन प्रकार से स्फुटित हो गई है अर्थात् मिट्टी फट गई हो, भूरे वर्ण की हो और उसमें गम्भीर भ्रमघटिका अर्थात चक्र बने पाए जाए, तो ऐसी भूमि त्र्यक्ष (शिव, त्र्यम्बक) की सिद्धि कराने वाली मानी जाती है। द्रुमानुसारेणभूगुणदोषं — वेणुगुल्मलताच्छाया द्विगुणां मध्यदूषिता। त्रिगुणा पुन्नागवृक्षैः क्षीरवृक्षैश्चतुर्गुणा ॥ 30 ॥ अब घर पर वृक्षों की पड़ने वाली छाया के दोष बताए जाते हैं। बांसों के झुरमुट से पड़ने वाली छाया भवनों के लिए दुगुनी मध्य दूषिता कही गई है। पुन्नाग अथवा सुपाड़ी के वृक्षों की छाया तिगुनी और दूध वाले वृक्षों की छाया चतुर्गुणी दूषिता है। पञ्चधाश्वत्थवृक्षैश्च षड्धा धात्री महीरुहैः। सप्तधा पूर्णवृक्षैश्च लिङ्गच्छाया तथाष्टधा ॥ 31 ॥ अश्वत्थ वृक्ष की छाया वाली भूमि पाँच गुणी दूषित है। इसी तरह आँवले के पेड़ की छाया छह गुणी, पूर्ण वृक्ष की छाया वाली सात गुणी और शिवलिङ्ग की भवन पर पड़ने वाली भूमि आठ गुणी हानिकारक है। एताश्च्छायाः परित्यज्य वेश्म कुर्याद्यथाभयम्। वृक्षप्रासादयोश्च्छायां गृहे त्यक्ता शुभप्रदा ॥ 32 ॥
- 'कापादैः ?' इति प्रकाशित पाठः। 'काकपदै' या 'कप्पिलः' पाठ स्यात्।
सूत्र-५१ 261 अस्तु, इन छाया से भयभीत रहते हुए ही, इन छायाओं को छोड़कर ही घर बनाएँ क्योंकि यह एक ध्रुव सत्य मानकर चलें कि वृक्षों की और देव मन्दिरों की छाया घरों पर नहीं पड़े। यही शुभप्रद है। ऐसे में छायाओं को त्यागकर ही घर बनाएँ। द्वयोः प्रहरयोश्च्छाया वृक्षप्रासादगुल्मजा। हर्म्यगृहे तथैवं स्यादधःस्तान्नैव निन्दिता ॥ ३३ ॥ जिन वृक्षों, प्रासादों और गुल्मों से दोपहर में होने वाली छाया हवेलियों और घरों पर पड़ती है, वह अवश्य ही त्याज्य है परन्तु जो छाया उन घरों और हवेलियों से नीचे ही रह जाती है, वह निन्दित नहीं समझी जाती है। अका अशोका अश्वत्थाः केतकीबीजपूरकाः। यस्मिन् गृहे प्ररोहन्ति तद् गृहं नैव वर्द्धते ॥ ३४ ॥ जिस घर में आक, अशोक, अश्वत्थ, केतकी, बीजोरा (बीजपूरक, जम्बीर) के वृक्ष उगते हैं, उस घर में कभी भी वृद्धि, सम्पन्नता, सुख आदि नहीं बढ़ते। दाडिमं च हरिद्रां च श्वेतां च गिरिकर्णिकाम्। यदिच्छेदात्मनः श्रेयो गृहद्वारे न रोपयेत् ॥ ३५ ॥ दाड़िम, हल्दी, श्वेता, गिरिकर्णिका आदि वृक्षों को अपनी भलाई चाहने वाले व्यक्ति कभी भी अपने गृह के द्वार के पास रोपण न करें। त्यक्त्वा चोग्रतमं वृक्षं कटुकं कण्टकान्वितम्। अपि सौवर्णिकान्वृक्षान् गृहाश्रये न रोपयेत् ॥ ३६ ॥ इसी तरह उग्रतम समझे जाने वाले वृक्ष, कड़वे वृक्ष, काँटों वाले वृक्ष, सुनहरे पुष्पों वाले, कनेर के वृक्ष भी घर के पास नहीं रोपण करें। न्यग्रोधोदुम्बरप्लक्षांस्तथा वै कार्मुकादिकान्। वर्जयेद् गृहमाश्रित्य हर्म्यवृद्धिर्न विद्यते ॥ ३७ ॥ बरगद, उदुम्बर, पलाश और सुपाड़ी के वृक्ष घरों के पास हों तो वे भी वर्जनीय है क्योंकि इनके रहते हवेली और घरों में सम्पन्नता की वृद्धि नही होती है। खर्जूरी दाडिमी रम्भा कर्कन्धू बीजपूरिका। यस्मिन् गृहे प्ररोहन्ति तद् गृहं नैव वर्द्धते ॥ ३८ ॥¹
- तुलनीय- बदरी कदली चैव दाडिमी बीजपूरिका। प्ररोहन्ति गृहे यत्र तद् गृहं न प्ररोहति ॥' (वृक्षायुर्वेद : सुरपालकृत, सम्पादक - श्रीकृष्ण 'जुगनू', चौखम्बा, वाराणसी, 2004, 29, समराङ्गणसूत्रधार 48, 131)
262 अपराजितपृच्छा खर्जूर, दाड़म, केला, कर्कन्धू (करौन्दा) और बीजोरा जिन घरों में उगते हैं, वे कभी वृद्धि नहीं पाते हैं। अथ भूमिस्थनिधिसाधनं — नकुलश्चोरगो यत्र क्रीडतः स्नेहत उभौ। तत्रस्थाने महीं खात्वा द्रव्यं तिष्ठति निश्चयम् ॥ ३९ ॥ अब भूमि में गड़े धन आदि द्रव्यों को जानने के लक्षण बताये जा रहे हैं— जिस स्थान में नेवले और सर्प आपस में दोनों स्नेहपूर्वक क्रीड़ा करते पाए जाएँ ऐसे स्थान की भूमि को खोदने पर निश्चय ही द्रव्य, धन होने का पता लगता है।¹ बिडाला मूषकाः स्नेहाद्रमन्ते च परस्परम्। तत्र स्थाने महीं खात्वा द्रव्यं तिष्ठति निश्चयम् ॥ ४० ॥ जिस स्थान पर बिल्लियाँ और चूहे आपस में, परस्पर स्नेहपूर्वक रमण करते हों, उस स्थान की भूमि खोदने पर भी निश्चय ही धन और द्रव्य मिलता है। सर्पाश्च मूषकाः स्नेहात् क्रीडन्त्यानन्दरूपकाः। तत्र स्थाने महीं खात्वा द्रव्यं तिष्ठति निश्चयम् ॥ ४१ ॥ इसी तरह जिस स्थान पर सर्प और चूहे भी प्रेमपूर्वक और आनन्द में क्रीड़ा करते पाए जाएँ, उस स्थान में भी भूमि खोदने पर निश्चय ही धन और द्रव्य की प्राप्ति होती है।
- भूमिगत द्रव्य या दफीनों की खोज का बहुत रोचक विषय रहा है। प्राचीन भारत में तान्त्रिकों ने इस प्रकार की विधियों के अनुसन्धान में ही अपने को लगाए रखा है। रुद्रादि यामलों, स्वरशास्त्रों में भी इस विषय का वर्णन मिल जाता है। 'नरपतिजयचर्यास्वरोदय' में यह वर्णन आया है। वराहमिहिर, मेघमालाकार ने काकाण्ड, खञ्जनदर्शन आदि का वर्णन करते हुए निधि प्राप्ति का वर्णन किया है जिसे मुहूर्त्ततत्त्वकार केशव दैवज्ञ ने भी दिया है। अपराजितपृच्छा के इस विषय के श्लोकों को सूत्रधार मण्डन ने वास्तुमण्डनम् के पहले अध्याय में उद्धृत किया है। कौतुकचिन्तामणि में भी उड़ीसा के राजा प्रतापरुद्रदेव ने इस विधि को दिया है। 'न' पाठ में इसके बाद श्लोक इस क्रम से मिलते हैं— नकुलोरुद्रभोश्च क्रीडास्ते हिस्तजोत्तमा। सूत्रस्थाने मर्हयित्वा द्रव्यं तिष्ठन्ति निश्चय ॥ ३८ ॥ यत्र ना दृश्यते शल्यं द्रव्यं वामं च योच्यते। सूत्रस्थाने महर्षित्वा द्रव्यं तिष्ठन्तिनिश्चयम् ॥ ३९ ॥ द्वारमध्ये कृतिकाश्च भरणीविशाखयो। शेषं पूर्वं विधातव्यं सनन्द सर्वकामयम् ॥ ४० ॥ इति मन्दवेदयुगैका वेदाश्च गर्भस्फुरितरा। स्वकीयौभित्तिभ्रमन्युक्ता च पदैकैका प्रकल्पयेत् ॥ ४१ ॥ द्विभागं कर्णमित्युक्तं भागद्वे तु च कर्णिका। प्रतिरथं सार्धभागं निर्गमं विस्तरं तथा ॥ ४२ ॥ पुनरंगरी अर्धभागं त्रिभागं अर्द्धविस्तरम्। निर्गमं भागमेकेन शिखराधो समुद्भवैत् ॥ ४३ ॥ वेदासभद्रविस्तारं तद्विस्तु विनिर्गमम्। चन्द्रावलोकनं कुर्याद् छाद्यघण्टा समन्वितम् ॥ ४४ ॥ शेषं पूर्वं विधातव्यं पीषदेच्छाद्यके कथम्। नागरोक्तं विधमानं च प्रयक्तं वास्तवेविधिः ॥ ४५ ॥ ('न' संज्ञक मातृका पत्र 51)
सूत्र-५१ 263 यत्र ना दृश्यते शल्यं द्रव्यं तत्र तथोच्यते। तत्र स्थाने महीं खात्वा द्रव्यं तिष्ठति निश्चयम्॥ ४२॥ जिस स्थान में किसी भी प्रकार का शल्य न पाया जाए तो समझो कि वहाँ भी द्रव्य है। अतः उस स्थान पर भी भूमि को खोदने पर धन, द्रव्य निश्चय ही मिलता है। अथाहिबलचक्रम् - अष्ट₈ पूर्वायता रेखा भिन्नाः पञ्च₅ समुद्धरेत्। पदैरष्टाविंशति₂₈ भिर्भृर्ऋक्षसङ्ख्यया तथैव च॥ द्वारमध्ये कृत्तिका च शाखयोर्भरणीमघे॥ ४३॥ (भूमिस्थनिधि के अवलोकन के लिए अहिचक्र की विधि कही जा रही है) इसके लिए सर्वप्रथम पूर्वापर आठ रेखाएँ खींचनी चाहिए और तिर्यक् या आड़ी पाँच रेखाएँ डालें। यह रचना इस प्रकार से की जाए कि अन्दर 28 कोष्ठक बन जाएँ। इन पदों में (अभिजित सहित) सभी 28 नक्षत्रों का इस प्रकार से न्यास किया जाना चाहिए कि द्वार के मध्य में कृत्तिका नक्षत्र और दोनों शाखाओं में मघा और भरणी नक्षत्र आ जाए। चन्द्रे द्रव्यं तथा सूर्ये शल्यं चैव विनिर्दिशेत्। अहिबलचक्रे प्रोक्ता ¹सारोद्धृत्यां च केवली॥ ४४॥ इस प्रकार केवली के स्वरशास्त्र में कहे गए अहिबल चक्र में विन्यसित नक्षत्रों में चन्द्रमा के नक्षत्रों से द्रव्य और सूर्य के नक्षत्रों से शल्य का ज्ञान करना चाहिए। अश्विन्यादि त्रिकं₃ चैव आर्द्रादि पञ्चकं₅ तथा। पूर्वाषाढा चतुष्कं₄ च रेवती चोत्तरात्रयम्॥ ४५॥ शशिभानि किलैतानि शिष्टानि रविभानि च।²
- 'स्वसरो धृत्याश्च केवली?' प्रकाशित पाठः। 'स्वरोधृत्यां च केवली' सुझाव पाठः। यहाँ ग्रन्थकार ने सारोद्धार नामक स्वरशास्त्र के साथ ही 'केवली' का उल्लेख किया है। बहुत सम्भव है कि यह केवली कवि नरपति हो। नरपति का नरपतिजयचर्या नामक ग्रन्थ स्वरशास्त्रों में बहुत प्राचीन और महत्वपूर्ण माना जाता है जिसका रचनाकाल शङ्करबालकृष्ण दीक्षित (भारतीयज्योतिष, पृष्ठ 624) ने विक्रम संवत् 1232 (शकाब्द 1097 तद्नुसार 1175 ई.) माना है। नरपति को जैन मतावलम्बी कहा गया है, इसलिए भुवनदेव ने सम्भवतः उन्हें केवली कहा हो। वे अन्हिलपट्टन के थे और उनके पिता आम्रदेव धारानगरी में रहते थे। इस ग्रन्थ को सारोद्धार भी कहा जाता है- पुस्तकेन्द्रं पटौकश्रीदर्पणं ज्योतिपार्णवम्॥ सारोद्धारं प्रवक्ष्यामि...। प्रस्तुत वर्णन नरपति के आधार पर किया गया प्रतीत होता है।
- सूत्रधारमण्डनकृत वास्तुमण्डनम् में ये श्लोक इस रूप में आए हैं- अश्विन्यादित्रिकं₃ चैव आर्द्राद्याश्चैवपञ्चकम् ₅। पूर्वाषाढाचतुष्टं₄ च उत्तरारेवतीद्वयम् ₂॥ एतानि शशिधिष्ण्यानि शेषाणि रविभानि च। (वास्तुमण्डनम् 1, 160-161)
264 अपराजितपृच्छा अश्विन्यादि तीन (अश्विनी, भरणी व कृत्तिका), आर्द्रा आदि पाँच (आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा व मघा), पूर्वाषाढादि चार (पूर्वाषाढा, उत्तराषाढ, अभिजित् व श्रवण) तथा रेवती और उत्तरात्रय नक्षत्रों को मिला कर कुल सोलह नक्षत्र चन्द्रमा के नक्षत्र होते हैं और शेष नक्षत्र (रोहिणी, मृगशिरा, पूर्वाफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, धनिष्ठा, शतभिषा) सूर्य के हैं। चन्द्रर्क्षे च स्थिते सूर्ये चन्द्रे सूर्यर्क्षसंस्थिते ॥ 46 ॥ तत्र शून्यं भवेत्स्थानं द्रव्यशल्यविवर्जितम्। जब चन्द्र के नक्षत्र सूर्य के नक्षत्र में और सूर्य के नक्षत्र चन्द्र में समागत हों, ऐसे योग में उक्त स्थान पर कुछ भी नहीं होता है, न द्रव्य और न शल्य ही मिलता है। द्रव्यशल्यविना त्वेतं ¹शल्यद्रव्यं विनिर्दिशेत् ॥ 47 ॥ चन्द्रः पूर्वं परं भानुस्तत्र शल्यं विनिर्दिशेत्। भानुः पूर्वं परं चन्द्रस्तत्र शल्यं विनिर्दिशेत् ॥ 48 ॥² किन्तु यदि सूर्य व चन्द्रमा अपने अपने-अपने नक्षत्र में हों तो वहाँ धन व शल्य दोनों ही कहना चाहिए। गणना से यह ज्ञात करें कि यदि चन्द्र पूर्व नक्षत्र में और सूर्य परवर्ती नक्षत्र में हो तो उस भूमि में हड्डी होती है और सूर्य पूर्व तथा चन्द्रमा परवर्ती नक्षत्र में स्थित हो तो भी वहाँ शल्य बताना चाहिए।³ नरपति में यह श्लोक इस प्रकार है जिसका आशय है कि अश्विनी से तीन, आर्द्रा से पाँच एवं पूर्वाषाढ़ा से चार व रेवती-पूर्वाभाद्रपद- ये चन्द्रमा के नक्षत्र है और शेष सूर्य के नक्षत्र हैं-अधींशपूर्वाषाढादित्रिं पञ्च चतुष्टयम्। रेवती पूर्वाभाद्रेन्दोर्भानि शेषाणि भास्वतः ॥ (नरपति. नाडीचक्रप्रकरणम् 1, 9) नरपति ने सम्पूर्ण चक्र इस प्रकार बताया है— अहिचक्रं प्रवक्ष्यामि यथा सर्वज्ञभाषितम्। द्रव्यं शल्यं तथा शून्यं येन जानन्ति साधकाः॥ निधिर्निर्वर्तनैकस्थः सम्भ्रान्तो यत्र भूतले। तत्र चक्रमिदं स्थाप्यं स्थानद्वारमुखस्थितम्॥ ऊर्ध्वरेखाष्टकं लेख्यं तिर्यक् पञ्च तथैव च। अहिचक्रं भवेत्येवमष्टाविंशति कोष्ठकम्॥ तत्र पौष्णाश्वि याम्यर्क्षं कृत्तिकार्पितृभाग्यकम्। उत्तराफाल्गुनी लेख्यं पूर्वपङ्क्त्यां भसप्तकम्॥ अहिर्बुध्न्याजपादक्षं शतभं ब्राह्मसार्पभम्। पुष्यं हस्तं समालेख्यं द्वितीयां पङ्क्तिमास्थितम्॥ विधिविष्णुर्धनिष्ठाख्यं सौम्यरोद्रेन्द्रपुनर्वसू। चित्राभं च तृतीयायां पङ्क्तौ धिष्ण्यस्य सप्तकम्॥ विश्वक्षं तोयभं मूलं ज्येष्ठा मैत्रविशाखिके। स्वाती पङ्क्त्यां चतुर्थ्यां च कृत्वा चक्रे प्रस्तारः पन्नगाकृतिः। द्वारशाखामघायाम्ये द्वारस्था कृत्तिका मता॥ (नरपति. पूर्वोक्त 1, 8)
- 'शल्यद्रव्यादि कथ्यते?' प्रकाशित पाठः।
- वास्तुमण्डनम् में उक्त श्लोक इस रूप में मिलते हैं— चन्द्रधिष्णैस्थितेसूर्ये सूर्यचन्द्रसमागते॥ तत्र शून्यं भवेस्थानं द्रव्यशल्य विवर्जितम्। द्रव्यशल्यविना ह्येवशल्यद्रव्यं विनिर्दिशेत्॥ चन्द्रपूर्वापरोभानुस्तत्र शल्यं विनिर्दिशेत्। भानुपूर्वापरश्चन्द्रस्तत्र द्रव्यां विनिर्दिशेत्॥ (वास्तु. 1, 161-163)
- उक्त प्रसङ्ग में नरपति. का मत विचारणीय है चन्द्र व सूर्य के नक्षत्र को जानकर देखें कि दोनों अपने नक्षत्र में हैं अथवा दूसरे के नक्षत्र में, यदि चन्द्रमा के नक्षत्र में सूर्य व चन्द्रमा दोनों हों तो उस स्थान में निश्चय ही द्रव्य होता है। सूर्य के नक्षत्र में दोनों हों तो शल्य होगा और कोई पदार्थ नहीं। यदि दोनों
265 सूत्र-५१ सूर्यचन्द्रनक्षत्रसाधनम् — गतघटि ऋक्षभघ्नाः₂₇ (हताः ? ) षष्ठिहते₆₀ च शेष कम्। रविशशिभुक्तकालं रविचन्द्रर्क्षलग्नकम् ॥ 49 ॥ भूमिस्थ निधि प्राप्ति के लिए प्रश्न की गत घटियों को 27 से गुणा करें और उसमें 60 का भाग दें तो प्राप्त फल सूर्य व चन्द्रमा का भुक्तकाल होगा और यही सूर्य व चन्द्रमा के नक्षत्रों से लग्न होगा । (यदि प्राप्त नक्षत्र की संख्या में अश्विन्यादि गत नक्षत्र जोड़ा जाएगा तो अश्विन्यादि क्रम से चन्द्रमा के नक्षत्र का पता चलेगा।)² अपने-अपने नक्षत्र में हों तो दोनों पदार्थ होंगे व इनके विपरीत हो तो कुछ नहीं होता है। नवांश के अनुमान से भूमि का अनुमान किया जाना चाहिए। यदि चन्द्रमा क्रूर ग्रह से युक्त हो तो द्रव्य नहीं मिलता है। पूर्ण चन्द्रमा हो तो पूर्ण द्रव्य, क्षीण चन्द्रमा हो तो अल्पद्रव्य होता है। ग्रह दृष्टि के अनुरूप द्रव्य नव प्रकार का होता है। सूर्यादि ग्रहों का क्रम से स्वर्ण, रजत, ताम्र, पित्तल, रत्न, काँसा, लोहा, शीशा और नाग। चन्द्रमा को जो ग्रह देखता है उसके अनुसार द्रव्य होता है। मिश्र ग्रह देखते हैं तो मिश्रद्रव्य होगा। यथा— चन्द्रऋक्षे यदाऽर्केन्दू तत्रास्ति निश्चितं निधिः। भानुऋक्षे स्थितौ तौ चेत्तदा शल्यं च नान्यथा। स्वस्वभे द्वितयं ज्ञेयं नास्ति किञ्चिद्विपर्यये। नवांशकानुमानेन भूमानं तस्य कल्पयेत्। स्थितं न लभते द्रव्यं चन्द्रे क्रूरग्रहान्विते॥ पुष्टे चन्द्रे भवेन्मुद्रा क्षीणे चन्द्रेऽल्पको निधिः। ग्रहदृष्टिवशात्सोपि विज्ञेयो नवधा बुधैः ॥ हेमं तारं च ताम्रारं रत्नं कांस्यायसं त्रपु। नागं चन्द्रे विजानीयाद्भास्करादिगृहेक्षिते ॥ मित्रैर्मित्रं भवेद् द्रव्यं शून्यं दृष्टिविपर्यये। सर्वग्रहेक्षिते चन्द्रे निर्दिष्टोऽसौ महानिधिः ॥ शुभक्षेत्रगते चन्द्रे लाभः स्यान्नात्र संशयः । पापक्षेत्रे न लाभो हि विज्ञेयः स्वरपारगैः ॥ हेमं तारं च ताम्रं च पाषाणं मृन्मयायसम्। सूर्यादिगृहगे चन्द्रे द्रव्यभाण्डं प्रजायते ॥ भुक्तराश्यंशमानेन भूमानं काम्बिकैः करैः। नीचे द्विघ्नं परं नीचे जलस्थोऽसौ भवेन्निधिः ॥ स्वोच्चस्थे भूर्ध्वगं द्रव्यं नवांशक क्रमेण च। परमोच्चे परे तुङ्गे भित्तिस्थमृक्षसङ्क्रमे ॥ (नरपति. वही 11-21)
- वास्तुमण्डनम् और नरपतिजयचर्या में आया है कि निधि की प्राप्ति के लिए प्रश्नकालिक नक्षत्र में उदय से जितनी घड़ी बीत गई हो अर्थात् भयात घटिकाओं को 27 से गुणाकर 60 से या भभोग से भाग देने पर लब्धि नक्षत्र, घटीपल मिलें, उस नक्षत्र की संख्या में अश्विन्यादि गत नक्षत्र की संख्या को जोड़ने पर अश्विन्यादि क्रम से चन्द्रमा के स्पष्ट नक्षत्र का ज्ञान होता है। मूल श्लोक में ग्रन्थकार 60 की कल्पना भभोग के स्थान पर करता है किन्तु टीकाकार ने भभोग से ही भाजित करना उचित माना है। नाक्षत्रिय साठ घटिकात्मक चक्रानुसार नक्षत्रों का परिभ्रमण ध्यान में रखकर उक्त प्रकार से ही गणना की जानी उचित है— उदयादिगता नाड्यो भघ्नाः षष्ट्यावशेषके। दिनेन्दुर्भुक्तियुक्तोऽसौ भवेत्तात्कालचन्द्रमाः ॥ (वास्तु. 1,164 एवं नरपति. वही 10) जिस तरह चन्द्र नक्षत्र के भयात भभोग से स्पष्ट चन्द्रमा का साधन कहा गया, उसी प्रकार इष्ट समय में नक्षत्र स्थित सूर्य का साधन किया जाना चाहिए। अर्थ यह है कि जिस नक्षत्र में सूर्य हो, उसमें सूर्य के प्रवेश काल से इष्टकाल तक गत दिनादि को सूर्य सम्बन्धी भयात माने और आगे के नक्षत्र में सूर्य के प्रवेश दिन से पूर्व तक भभोग दिन समझकर क्रिया कनी चाहिए। फिर यह देखना चाहिए कि ये दोनों अपने-अपने नक्षत्र में अथवा भिन्न-भिन्न नक्षत्र में हैं— चन्द्रवत् साधयेत् सूर्यमिष्टर्क्षं चेष्टकालिकम्। पश्चाद्विलोकयेत्तो चेत्स्वर्क्षे वा चान्यभे स्थितौ ॥ (वास्तु. 1, 165, एवं नरपति. वही 11)
इत्यमनन्तर वर्णानुसारेणयोग्याययोग्यभूमिलक्षणं — श्वेता च ब्राह्मणी भूमी रक्ता वै क्षत्रिया स्मृता। पीतवर्णा भवेद्वैश्या शूद्री तु कृष्णवर्णिनी ॥ 1 ॥¹ अब रङ्ग, वर्ण के अनुसार भूमि के लक्षण कहते हैं। जो भूमि श्वेत वर्ण की हो, वह ब्राह्मणी भूमि होती है, रक्तवर्णा क्षत्रिया, पीतवर्णा वैश्या तथा कृष्णवर्णा भूमि शूद्री होती है। गन्धानुसारेणभूमिलक्षणं — घृतगन्धा भवेद्विप्री राज्ञी रक्तानुगन्धिनी। क्षारगन्धा भवेद्वैश्या शूद्री विष्ठानुगन्धिनी ॥ 2 ॥ जिस भूमि से घी जैसी गन्ध आए, वह भूमि विप्रा होती है, रक्तगन्धा भूमि राज्ञी या क्षत्रिया, क्षारगन्धा भूमि वैश्या तथा विष्ठानुगन्धिनी भूमि शूद्री होती है। स्वादानुसारेणभूमिः — ब्राह्मणी मधुरास्वादां कषाया क्षत्रिया तथा। क्षारास्वादा भवेद्वैश्या शूद्री स्यात्कटुका तथा ॥ 3 ॥ एवं परीक्षयेद् भूमिं वर्णैर्गन्धैश्च स्वादतः। गोमयेन समालिप्य नन्द्यावर्तं तु स्वस्तिकम् ॥ 4 ॥ ऐसी भूमि जो चखने पर मधुर स्वाद वाली हो, वह ब्राह्मणी भूमि होती है, कषाय स्वाद वाली भूमि क्षत्रिय, क्षार स्वाद वाली वैश्या तथा कटु स्वाद वाली भूमि शूद्री होती है। इस प्रकार भूमि का वर्ण, गन्ध और स्वादानुसार परीक्षण किया जाना चाहिए। इसके बाद उस भूमि को गोबर से लीप कर उस पर नन्द्यावर्त स्वस्तिक बनाएँ। स्थापयेदामघटं वर्धमानेन संयुतम्। घृतेन ज्वालयेद्वर्तीश्चतस्रश्च चतुर्दिशम् ॥ 5 ॥ फिर उस स्वस्तिक पर कच्चा घड़ा और उस पर बीजोरा या ढक्कन रखा हुआ हो, ऐसा रखें तथा उस घट पर चारों ओर चार दिशाओं में जलने वाली बातियाँ रखे और उन्हें घी से जलाएँ, दीपक बनाएँ। आद्योद्भवे यथा वर्तिस्तदूर्णा सा मही मता। सूत्रधारस्य हस्ते तु कुद्दालं तु तथोत्तमम् ॥ 6 ॥
- यहाँ से इसी सूत्र के 12वें श्लोक के बाद का विषय पुनः आरम्भ होता है। 'न' मातृका में इस क्रम से उक्त श्लोक नहीं मिलते हैं।
सूत्र-५१ 267 इस अवसर पर देखें कि जो वर्तिका पहले ऊँची जलती दीखे, उसी के अनुसार उस भूमि का वर्ण निश्चय करें, और तब सूत्रधार के हाथ में उत्तम कुदाली दें। स्थित्वा पूर्वाभिमुखतः शुचिः स्नातो जितेन्द्रियः। शुक्लोम्बरधरो नित्यं शुक्लमाल्यानुलेपनः ॥ 7 ॥ प्रहारं दापयेत्तत्र लक्ष्येद्रेणुमुच्छ्रितम्। पूर्वापरयाम्योत्तरं वर्णैः प्राच्यादिशस्तकम् ॥ 8 ॥ सूत्रधार जो कि पवित्र हो, स्नानादि से शुद्ध हो, जितेन्द्रिय, श्वेत वस्त्रधारण किए हो और नित्य श्वेतपुष्पों की माला पहनकर श्वेत चन्दन का अनुलेप तिलक आदि करता है, पूर्वाभिमुख स्थित होकर उस कुदाल से प्रहार करें और जो मिट्टी उस प्रहार से निकले, उसे ध्यानपूर्वक देखें कि वह किधर अधिक गिरती है— पूर्व की ओर या पश्चिम या दक्षिण अथवा उत्तर की ओर? इसी के अनुसार पूर्वादि दिशा क्रम से भूमि का वर्ण निश्चित करें जो शास्त्रसम्मत माना जाता है। ततो वास्तुं च सम्पूज्य तत्तत्क्षेत्रेषु कल्पितम्। पुष्पाक्षतैः समालिख्य निलयाधः प्रमाणतः ॥ 9 ॥ इसके उपरान्त ही वास्तु का पूजन करें और उस क्षेत्र के नक्शे के अनुसार डाकवेल या आकार कल्पित करें तथा पुष्प, अक्षतादि से समस्त निलयों (कमरों) को प्रमाणानुसार अङ्कित कर दें। सूत्रधारो महाप्राज्ञ शुक्लोम्बरधरः शुचिः। करे गृहीत्वा कुद्दालं दृढश्चैकाग्रमानसः ॥ 10 ॥ तूरवादित्रनिर्घोषैर्मङ्गलैः शब्दसङ्कुलम्। प्रहारं दापयेत्तत्र तत्कुक्षौ वह्निगोचरे ॥ 11 ॥ पुनः कहते हैं कि श्वेत वस्त्रधारी, पवित्रभाव वाले सूत्रधार महाप्राज्ञ को चाहिए कि वह दृढ़ और एकाग्रमन से कुदाल को ग्रहण करें और गाजे-बाजे के साथ उच्च मङ्गल गीतों के गान, कोलाहल के बीच कुदाल के प्रहारों से उस भूमि के कुक्ष को खोदकर बाहर निकाल कर दिखाएँ। दिशानुसारेण रेणुपतनफलं — उद्धृते चैव कुद्दाले ततो रेणुं निरीक्षयेत्। उत्तरे तु भवेत्क्षेमं पश्चिमे पुत्रपौत्रकम् ॥ 12 ॥ और, कुदाल से निकाली गई मिट्टी का पुनः ठीक-ठीक ढंग से निरीक्षण करें कि उक्त मिट्टी यदि उत्तर की ओर गिरे तो क्षेम-कुशल होता है और पश्चिम में गिरे
208 अपराजितपृच्छा तो पुत्र-पौत्र की वृद्धि होती है। पूर्वे तथोत्तमं विद्यादीशाने मोक्षदायकम् । इतरासु चतुर्दिक्षु सर्वदोषसमुद्भवः ॥ 13 ॥ पूर्व की ओर से सर्वोत्तम जाने और ईशान की ओर गिरे तो मोक्षदायक मानें। इनके अलावा चारों दिशाओं में जो इतर रह जाती है, सभी प्रकार के दोषों को उत्पन्न करने वाली है। कीलकरोपणविचार - आनीय कीलकं सूत्रं रोपयेच्च चतुर्दिशम् । कीलकस्य च सूत्रस्य वर्णभेदांश्च लक्षये ॥ 14 ॥ अब कीलक के वर्ण भेद बताते हैं— पहले कीलक को लाकर स्थापित करें और उस पर चारों ओर सूत्र लपेटें। इससे कीलक और सूत्र के वर्ण भेद देखे जाते हैं। प्रशस्यन्ते ब्राह्मणानां कीला आश्वत्थकीलकाः । उदाहृता क्षत्रियाणां खादिरा रक्तचन्दनाः ॥ 15 ॥ ब्राह्मणों के लिए अश्वत्थ का कीलक प्रशस्त है और क्षत्रियों के लिए खदिर और रक्त चन्दन के कीलक शुभ हैं। शिरीषशालतालानां वैश्यजातेः प्रकीर्तिताः । सर्जकार्जुनयोस्त्वेवं शूद्राणां च सुखावहाः ॥ 16 ॥ वेश्यजनों के लिए शिरीष, शाल और ताड़ के कीलक शुभ कहे गए हैं और शूद्र समुदाय के लिए सर्जक और अर्जुन वृक्ष के कीलक सुखदायक होते हैं। कीलकस्य आयामप्रमाणं - द्वात्रिंशदङ्गुलो₃₂ विप्रे चाष्टाविंशतिः₂₈ क्षत्रिये । चतुर्विंशाङ्गुलो₂₄ वैश्ये शूद्रे विंशाङ्गुलो₂₀ भवेत् ॥ 17 ॥ अब कीलकों की लम्बाई के बारे में कहते हैं— ब्राह्मणों के लिए 32 अङ्गुल लम्बे कीकल, क्षत्रियों के लिए 28 अङ्गुल लम्बे, वैश्यों के लिए 24 अङ्गुल लम्बे और शूद्रों के लिए 20 अङ्गुल के कीलक प्रशस्त कहे गए हैं। चतुरश्रो भवेद् विप्रे चाष्टाश्रः क्षत्रिये मतः । षोडशाश्रस्तु वैश्ये स्याद् वृत्तं शूद्रे प्रकीर्तितः ॥ 18 ॥ इसी तरह ब्राह्मणों के कीलक चतुरस्र (चौकोर) हो, क्षत्रियों के कीलक अष्टाश्र (अष्टकोणीय), वेश्यों के कीलक षोडशास्र (सोलहकोणीय) हो और शूद्रों के लिए कीलक गोलाकार होने चाहिए।