भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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254 भूपरीक्षाग्रहकीलकारोपणमेकपञ्चाशं सूत्रम् ॥ 51 ॥ विश्वकर्मोवाच - भूमेः परिग्रहं कृत्वा समावनिमित्तिक्रमैः । दिव्यानि वीक्ष्य भौमानि शुभान्यशुभकानि च ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि भूमि का परिग्रह करके निर्माणार्थ चयन करके सात प्रकार से भूमि परीक्षा क्रमानुसार करें। इस क्रम में पहले दिव्योत्पात, भौमोत्पात् आदि निमित्तों¹ का शुभाशुभ भी देख लेना चाहिए। शुभेषु प्रस्थिते सिद्धिर्विजयः स्यान्महोत्सवः । अशुभेषु निवर्तेत न गच्छेत् पदमग्रतः ॥ 2 ॥ शुभ निमित्त होने पर काम शुरू करने पर सिद्धि और विजय मिलती है तथा सदा महोत्सव होते रहते हैं परन्तु अशुभ निमित्तों में कोई काम नहीं करना चाहिए और एक पद भी आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। तन्मध्ये तथा थानं शकुनानि न लक्षयेत् । चेष्टायुक्तिसमाख्यातं तत्फलं शकुनोत्तमैः ॥ 3 ॥ उन निमित्तों के मध्य में तो उस थान अर्थात् स्थान का शकुन आदि का भी देखना उचित नहीं अस्तु, केवल चेष्टा युक्ति के रूप में प्रसिद्ध प्रयोग मात्र ही किए जाने चाहिए, इन्हीं को उत्तम शकुन और उनकी फलश्रुति के रूप में जानना चाहिए। आचार्यप्रशंसाह - आचार्यः सूत्रधारैश्च यजमानैश्च संयुतः । त्रयश्च साधकैश्चैव कर्मकारादिसंयुताः ॥ 4 ॥ आचार्य, सूत्रधार और यजमान अर्थात् गृहकर्ता के साथ-साथ कर्मकर या अन्य कार्य करने वाले आदि जन (वास्तुकार्य में) जुड़ते हैं। आचार्यश्च स्वयं ब्रह्मा शिल्पी चैव जनार्दनः । यजमानस्तु शक्रः स्यात् त्रिभिः कर्म प्रवर्तते ॥ 5 ॥ वास्तुकर्म में प्रमुख आचार्य स्वयं ब्रह्मा रूप है और शिल्पी जनार्दन विष्णुरूप है तथा यजमान स्वयं इन्द्र स्वरूप में होता है; इन तीनों के समन्वय से ही सभी कार्य आगे बढ़ते हैं।

  1. मत्स्यपुराण और विष्णुधर्मोत्तरपुराण सहित बृहत्संहिता आदि में इन उत्पातों का वर्णन आया है। अद्भुतसागर और कृत्यकल्पतरु का शान्तिककाण्ड इन उत्पातों की शान्तियों पर ही लिखे गए बृहत्संग्रह हैं।