अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 300, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्रधार को इन वितानों के ऊपरी भाग में निर्माण के काम जैसे संवरणा, घण्टा, कूट के समाकुलों की रचना, सिंहों की सङ्घटना के समूहों आदि की भी जानकारी होनी चाहिए। शुक्लाम्बरधरः सूत्र स्वस्थचित्तः समाहितः । पूजापरिग्रहं दद्यादात्मचिन्ता तु दैवते ॥ २० ॥ इसके अलावा स्वयं सूत्रधार की वेशभूषा, स्वभाव में भी कई विशेषताएँ होनी चाहिए, यथा— वह स्वच्छ श्वेत वस्त्रधारी हो, स्वस्थचित्त हो, समाहित हो, निर्लेप हो, पूजा और परिग्रह मूर्ति में आत्मचिन्तनपूर्वक देवता भक्ति हो। तुष्टिदानं ततो दद्यात्सर्वकर्मसु वै तथा। सुभृत्यांस्तोषयेत्तत्र कर्मकारापरैः सह ॥ २१ ॥ सभी कर्मों में सदा सन्तुष्टि प्रदान करता हो तथा अपने आधीन काम करने वाले समस्त कर्मकारी भृत्यों को सन्तोष और प्रेम से साथ लेकर चलता है। तोषितैः सर्वसूत्रैश्च गुरुतः क्षेममाप्नुयात् । निर्विघ्नं च भवेत्तत्र सर्वकामफलं भवेत् ॥ २२ ॥ क्योंकि, सभी सूत्रधारों, कर्मकरों के गुरु की भाँति अपने अनुग्रह में रखकर उनको सन्तुष्ट रखते हुए उनके क्षेम-कुशल का पूरा ध्यान रखने से सभी काम निर्विघ्न पूर्ण होते हैं और सभी कामनाएँ फलीभूत होती है। सिद्धिं विनायकं चादौ क्षेत्रपालांस्ततोऽर्चयेत् । पूजयेदुक्तविधिना योगिनीश्च कुमारिकाः ॥ २३ ॥ अस्तु, जब भी कोई वास्तुकर्म का समारम्भ हो तो सदा ध्यान रखे कि सबसे पहले सिद्धि-विनायक की पूजा-अर्चना करें। इसके बाद क्षेत्रपाल की पूजा-अर्चना करें और बाद में उसी विधि से योगिनी और कुमारिकाओं की भी पूजा-अर्चना करें। भूपरिग्रहणं प्रोक्तं शुभं धात्रीपरीक्षणम् । पूर्वं त्वेवं प्रवक्ष्यामि शृणु चैकाग्रमानसः ॥ २४ ॥ (हे अपराजित!) भू-परिग्रहण के लिए भी कहा है कि धरती की शुभ परीक्षा करके ही लेनी चाहिए जैसा पहले ही मैंने तुम्हें कहा, वही पुनः कहता हूँ जिसे एकाग्र मानस होकर सुनो। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सूत्रधारलक्षणाधिकारो नाम पञ्चाशं सूत्रम् ॥ 50 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सूत्रधार लक्षण अधिकार नामक पचासवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 50 ॥