अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 299, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें252 अपराजितपृच्छा है, उन सब प्रासादों के समस्त विभाग, उसके ऊर्ध्वरूप और तलछन्द (आधुनिक एलिवेशन प्लान्) को भी सूत्रधार को ठीक तरह से जानने चाहिएं। प्रासादों के शिखरों की विविध आकारों की रेखाएँ बनती हैं, उनकी जानकारी तथा घण्टा, कलश, ध्वजा आदि की भी पूर्ण जानकारी सूत्रधार को होनी चाहिए। द्वारशाखाविधिं ज्ञात्वा मूलप्रासादच्छन्दजम्। द्वारपालविधिश्चैव ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 15 ॥ इस तरह मूल प्रासाद के छन्द के अनुरूप ही प्रासाद की द्वार और द्वारशाखा निर्माण की विधि तथा द्वारों पर द्वारपाल की मूर्तियों के निर्माण की विधि भी सूत्रधार को अवश्य जाननी चाहिए। द्वारदृष्टिपदस्थानं तथाग्रे वाहनादिकम्। दृष्टिस्थानं चान्तरं तु ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 16 ॥ प्रासाद में पूज्य मूर्ति की दृष्टि द्वार के किस-किस भाग तक की प्रशस्त मानी जाती है तथा प्रधान मूर्ति के वाहन को मूर्ति के आगे कहाँ स्थापित किया जाए, उनमें दृष्टि स्थान का कितना अन्तर होना चाहिए, ये सब बातें भी सूत्रधार को अवश्य जानना चाहिए। लक्षणं च द्वास्रविधिं शिवलिङ्गेषु सर्वतः। मानोन्मानप्रमाणं च ज्ञायते सूत्रकर्मणा ॥ 17 ॥ एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है कि शिवलिङ्गों में सर्वत्र सभी जगह सब प्रकार से जो-जो लक्षण बताए गए हैं और उनके प्रासादों के भी द्वारों की जो-जो विधियाँ बताई गई हैं, उन सबका मान, उन्मान अर्थात् सही माप लम्बाई, ऊँचाई, चौड़ाई आदि प्रमाणों की जानकारी सूत्रधार के लिए परम आवश्यक है। वितानानि विचित्राणि क्षिप्तान्युत्क्षिप्तकानि च। मन्दारसभापद्मानि ज्ञायन्ते सूत्रकर्मणा ॥ 18 ॥ प्रायः प्रासादों, मन्दिरों में तरह-तरह के वितानों भी छतों की रचना कही गई हैं जिसमें कई विचित्र प्रकार की है, जैसे कोई क्षिप्त और अनुक्षिप्त अर्थात् बाहर की ओर उभरी हुई और भीतर की ओर दबी हुई आकृति अलङ्करणों से युक्त बनती है। उनमें सभा मण्डप की वितानों, छतों में ही मन्दार, कहीं पद्म आदि अलङ्करणों की रचना भी होती है, इनकी जानकारी भी सूत्रकर्म करने वाले सूत्रधार को अवश्य होनी चाहिए। वितानानां संवरणा घण्टाकूटसमाकुलाः। सिंहसङ्घटनाकीर्णा ज्ञायन्ते सूत्रकर्मणा ॥ 19 ॥